मैया मेरी

कीर्तन
एक बात मैया मेरी याद रखना... • मन्जू गोपालन/श्री सनातन धर्म महिला समिति, कीर्तन स्थान: बाग मुज़फ़्फ़र खां, आगरा यहां क्लिक करके यू ट्यूब पर देखिए मैया मेरी

Saturday, February 26, 2011

दयानन्द सरस्वती

महर्षि दयानन्द को नमन
(187वां जन्मोत्सव, 27 फ़रवरी 2011)
दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी।उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। 
उन्नीसवीं सदी में चारों ओर अराजकता का बोलबाला था। नर हत्या को खेल समझने वाले ठगों के आतंक से जनता सदा त्रस्त रहती थी। सामाजिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि चार आश्रमों और चार वर्णों की दृढ़ नींव पर टिके समाज की एक-एक चूल हिल रही थी। छुआछूत ने समाज को हजारों भागों में बांट दिया था। कन्याओं को गला घोंटकर मार दिया जाता था। विधवाओं को ढोल-धमाकों के साथ जबर्दस्ती सती कर देने को परम धर्म समझा जाता था। हजारों वर्ष के अपने पतन के सिलसिले को देखकर भारत मां खून के आंसू रो रही थी। ऐसे घनघोर अंधेरे में अचानक एक बिजली सी चमकी, रेगिस्तान में जैसे अमृत की धारा बह गयी। भारत मां को एक लाल मिल गया जिसको महर्षि दयानन्द सरस्वती के नाम से जाना जाता है।
सन्‌ 1824 में फ़ाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी को गुजरात में टंकारा ग्राम में श्रीकृष्ण जी के घर एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम मूलशंकर रख गया। बाद में शिक्षा व योग्यता के आधार पर विद्वानों ने इनको दयानन्द सरस्वती नाम दिया। वह प्रकाश का रक्षक एवं प्रचारक था। वह प्राणी मात्र का रक्षक था। वह सांसारिक प्रलोभनों और भोगों से लोहा लेने वाला धुरन्धर योद्धा और विजेता था। दयानन्द वह महामानव थाजिसने अध्यात्म को क्रियात्मक रूप देने में अभूतपूर्व सफ़लता प्राप्त की। उन्होंने कहा था कि योगी बनो, साथ ही कर्मयोगी भी बनो।वेदों की ओर लौटो। आत्मज्ञानी बनो परन्तु मानव भी बनो। वह उन व्यक्तियों में से थे जिन्हें वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन करके देवताओं की श्रेणी में अग्रणी माना जाता था। वे मानव जाति की प्रेरणा और आदर के पात्र रहे, आज भी हैं और सदा रहेंगे।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सर्वप्रथम स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने कहा था कि सुराज से स्वराज्य श्रेष्ठ है। स्वतन्त्रता संग्राम में 85% लोग उनके अनुयायी थे। कॉंग्रेस का इतिहास इस बात को प्रमाणित करता है। जितने भी शहीद हुए हैं उनके बारे में पता चलता है कि उनके प्रेरणास्रोत महर्षि दयानन्द ही थे।
अन्याय और काले धन का विरोध कर रहे योगगुरू के रूप में विख्यात बाबा रामदेव महर्षि दयानन्द सरस्वती के ही परम भक्त हैं। दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी। उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। वे मानते थे कि जन्म से कोई अछूत नहीं होता। स्वामी जी ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और जीव पूजा का समर्थन किया।  वे मानते थे कि भारत की गुलामी के मूल में मूर्ति पूजा ही रही है। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा पर बल दिया जिसका मुख्य नाम है ‘ओ३म्‌’ । उन्होंने लोगों को यज्ञ करने की प्रेरणा दी। उन्होंने पाखण्ड और अन्धविश्वास का हमेशा विरोध किया। शास्त्रार्थ किये। विश्वभर के विद्वानों को उनके आगे घुटने टेकने पड़े। वे एक महान्‌ योद्धा थे। उन्होंने वेदों का भाष्य हिन्दी में किया। स्वामी दयानन्द का प्रमुख ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जिसमें ईश्वर के 108 नामों की व्याखा व 1576 वेद मन्त्रों का विवरण दिया गया है।
उन्होंने सन्‌ 1875 में बम्बई (मुम्बई) में आर्य समाज की स्थापना की। आज आर्य समाज के करोड़ों सदस्य महर्षि के काम को आगे बढ़ा र्हैं। महात्मा गान्धी ने भी लिखा है- महर्षि दयानन्द सरस्वती भारत के आधुनिक ॠषियों व सुधारकों में श्रेष्ठ और अग्रणी थे। उनके कारण ही आज भारत  पुन: विश्व गुरू बनने को अग्रसर हो रहा है।
धन्य हैं ऋषि हैं आप, आपने जग जगा दिया। महर्षि दयानन्द सरस्वती के 187वें वर्ष पर हम उन्हें शत्‌शत्‌ नमन करते हैं।
• सुरेश आर्य
मन्त्री, आर्य समाज, वृन्दावन गार्डन, सहिबाबाद, उ.प्र.





Friday, February 4, 2011

धर्मान्तरित दलित

आरएल फ़्रांसिस
धर्मान्तरित दलितों का आरक्षण
दलित ईसाइयों को आरक्षण दिये जाने का मुद्दा हमारे यहां प्रायः उठता रहता है। इस मुद्दे को लेकर गैर सरकारी संगठन सेन्टर फ़ॉर पब्लिक इन्टरेस्ट लिट्टीगेशन और डी. डेविड द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं के कारण भी सबके सामने आए। इन्होंने संविधान में वर्णित अनुसूचित जाति आदेश 1950 के तीसरे पैराग्राफ की वैधानिकता को चुनौती दी। इसमें लिखा हुआ है कि हिन्दू, सिख, और बौद्ध के अलावा अन्य धर्म का पालन करने वाला अनुसूचित जाति का सदस्य आरक्षण से वंचित हो जाएगा।

दलित ईसाइयों को नौकरियों में आरक्षण देना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय की एक अन्य व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति के आदेश के अन्तर्गत अनुसूचित जाति और जनजाति की श्रेणियों में प्रविष्टियों के इस अन्तिम रूप में छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ताओं ने तर्क रखा कि न्यायालय द्वारा दी गयी व्यवस्थाएं छुटपुट सामग्री और तथ्यों पर आधारित है। परन्तु अब दलित ईसाइयों को आरक्षण का लाभ देने के पक्ष में व्यापक तथ्य और सामग्री जुटा ली गयी है। अतः अब इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पिछड़े और उपेक्षित धर्मांतरित ईसाइयों के एक बड़े वर्ग का मिशनवाद और पादरियों के विरुद्ध अभियान भी काफी समय से चल रहा है। इससे जुड़ी अनेक बातें मुझे कुछ समय पहले पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेण्ट के अध्यक्ष आर. एल. (राम लुभाया) फ्रांसिस ने एक मुलाकात में बतायी थीं। फ्रांसिस वर्षों से इन मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं।

चर्च संगठनों के भीतर ही समान अधिकारों के लिए उनकी लड़ाई जारी है। दलित ईसाइयों के लिए आरक्षण की वकालत की जा रही है जबकि इसकी जरूरत ही नहीं है। धर्मान्तरित ईसाइयों के प्रति ईमानदारी निभायी जाए तो उन पर धर्मान्तरण के बाद भी ‘दलित’ का ठप्पा लगाये रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दरअसल आदिवासी या वनवासी समुदाय में घुसपैठ बनाने में मिशनरी जितने सफल हुए हैं उतने हिन्दू दलितों में नहीं। फिर भी बड़ी संख्या में उनका विभिन्न प्रकार के तरीके अपनाकर लम्बे समय से धर्मान्तरण कराया जा चुका है और प्रयास जारी हैं। हिन्दू संगठन इसका निरन्तर विरोध भी करते रहे हैं। यही नहीं धर्मान्तरण पर रोक को लेकर कठोर कानून बनाये जाने की मांग भी लगातार उठती रहती है। 
चर्च और कॉंग्रेस दोनों ही हिन्दू संगठनों और भारतीय जनसंघ तथा आज की भारतीय जनता पार्टी का भय दिखाकर लोगों को अपने पक्ष में कर वोट बटोरते रहे हैं। जबकि आश्चर्य की बात यह है कि राजग के शासन के दौरान इस अल्प संख्यक समुदाय को किसी प्रकार की हानि नहीं हुई। मिशनरी लोगों को विश्वास में लिए बिना उनके निजी कानूनों में परिवर्तन करने में जुटे रहे हैं। यह बात उल्लेखनीय है कि लगभग 95 प्रतिशत लोगों को अपने अधिकारों और कानूनों के बारे में जानकारी ही नहीं है। मिशनरियों को छुटपुट घटनाओं को भी काफी बढ़ाचढ़ाकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने में गहरी रुचि रहती है। धन, अंधविश्वास, लालच, भय, सेवा, शिक्षा आदि का उपयोग करते हुए लम्बे समय से वे इस देश के नागरिकों को अपने समाज और अपने लोगों से काटकर कौन से पुण्य का काम कर रहे हैं। जाहिर है उनके ऐसे कार्य के विरुद्ध कभी-कभी हलकी या कठोर प्रतिक्रिया भी हो जाती है तब उन्हें अपने ऊपर हुए अत्याचार का हौआ खड़ा करने का अभियान चलाना पड़ता है।
भारतीय चर्च को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उन्हें इस देश में बहुसंख्यक समुदाय से भी ज्यादा धार्मिक स्वतंत्रता मिली हुई है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि चर्च की विस्तारवादी मानसिकता के चलते देश के कई भागों में टकराव की स्थिति पैदा होती रहती है। उड़ीसा के कंधमाल में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं लोग भूले नहीं होंगे। इससे भारत को दुनिया भर में काफी बदनामी भी झेलनी पड़ी। आज भी कुछ लोग और संगठन अपने स्वार्थो तथा मनमानी के चलते शांति के मार्ग में रोड़ा बने हुए हैं और वे देश को बदनाम करने का कोई अवसर कभी नहीं नही छोड़ते।
• टी.सी. चन्दर




Sunday, August 29, 2010

जन्माष्टमी-२०१०

श्री सनातन धर्म महिला समिति का
१२वां भव्य आयोजन
२ सितम्बर, २०१०, गुरुवार
श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव २०१०
आप सादर आमन्त्रित हैं
आयोजक: मन्जू गोपालन
विवरण पर्चा


































पृष्ठ ४ और १ (ऊपर), पृष्ठ २-३ (नीचे)
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Wednesday, August 25, 2010

माता-पिता

मातृ देवो भव, पितृ देवो भव

हम यह मान बैठे हैं कि समूची सृष्टि हमारे उपभोग के लिए है। उस पर हमारा ही अधिकार है, हम जैसे चाहें उसका उपभोग करें-उचित या अनुचित। हमें अपने दायित्वों का प्रायः ध्यान नहीं रहता या कहें, हम इस बात का ध्यान रखना ही नहीं चाहते। यह शुतुर्मुर्गी प्रवृत्ति हमें राक्षस बना रही है।

चित्त में मलिनता, संकीर्णता, दुर्भावना, राग-द्वेष आदि वृत्तियाँ भरी हुई हैं और तरह-तरह की वासनाएं लहर मार रही हैं। ऐसे में भजन-कीर्तन, सत्संग, तीर्थ यात्रा, प्रभु स्मरण आदि से कुछ भी भला होने वाला नहीं है। कलुषित मन मनुष्य को परमात्मा के आसपास भी नहीं फटकने देता। जो प्रभु को प्रिय है उसे अपनाए बिना प्रभु के निकट कोई पहुंच भी कैसे सकता है! इससे अभिन्नता के बिना उसकी प्राप्ति असम्भव है।

ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने जब तक मिला गाय का दूध दुहा और उपयोग किया। उसके बछड़े से खेले। उसे गाय माता के रूप में पूजा। जब गाय को दुह लिया तो उसे गलियों-सड़कों पर आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया। या फिर जब उसने दूध देना बन्द कर दिया तो गाय व्यर्थ हो गयी और उसे कसाई के हवाले कर दिया। अब ‘माता’ किस काम की! बूढ़ी, कमजोर और अनुपयोगी मां भी भला काम आ सकती है! बिलकुल यही स्थिति भारतीय घरों में माता-पिता के मामले में हो रही है। यह उपयोगितावादी प्रवृत्ति आज के समय में पहले की अपेक्षा कहीं अधिक तेजी से पनप रही है।

यह सोच कि बूढ़े हो चुके माता-पिता अब किस काम के हैं, काफी खतरनाक और हिंसक है। एक परिवार में दादा-दादी को मिट्टी के बरतन और पत्तलों में खाना खाते देख पोते ने सवाल किया तो दादा ने कहा कि जब आदमी बूढ़ा हो जाता है तो किसी काम का नहीं रहता सो उसके लिए ऐसे बरतन ही ठीक हैं। शाम को जब पापा घर आए तो बेटे ने उनसे मिट्टी के बरतन और पत्तलें लाने को कहा। पापा के कारण पूछने पर बेटे ने दादा की कही बात दुहरा दी। यह पता नहीं कि बेटे की बात सुनकर पापा की आंखें खुलीं या नहीं पर वास्तविकता यही है कि हम बबूल बोकर आम पाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।

दरअसल हम यह मान बैठे हैं कि समूची सृष्टि हमारे उपभोग के लिए है। उस पर हमारा ही अधिकार है, हम जैसे चाहें उसका उपभोग करें-उचित या अनुचित। हमें अपने दायित्वों का प्रायः ध्यान नहीं रहता या कहें, हम इस बात का ध्यान रखना ही नहीं चाहते। यह शुतुर्मुर्गी प्रवृत्ति हमें राक्षस बना रही है। जिन्होंने अपनी सन्तान के लिए अपना तन-मन-धन सब न्यौछावर कर दिया, उनके भविष्य और आने वाली पीढ़ी के लिए स्वयं को अर्पित कर दिया। सदा अपनी सन्तान के सुख की खातिर अपना सुख नहीं देखा। इसके बदले उन्हें मिला क्या? वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम, विधवाश्रम या महिलाश्रम आदि ही न!

बुजुर्गों के लिए नित नये ‘आश्रम’ बन रहे हैं। उनके लिए घर में जगह नहीं है। अंग्रजी शिक्षित परिवारों, सुसज्जित आधुनिक घरों और स्वार्थी लोगों में चुके हुए पुराने जमाने के मां-बाप फिट नहीं बैठते। उनकी धन-सम्पत्ति और जमीन-जायदाद ही काम की होती है। बुजुर्गों के प्रति ऐसा रवैया मानसिक रूप से बीमार समाज का परिचायक है। यह स्थिति सचमुच दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।

अनुभवों की खान बुजुर्गों की उपेक्षा-अनदेखी निःसन्देह अशुभ है। मानव जीवन की उन्नति और सद्गणों के विकास के लिए वृद्धजनों की उपस्थिति आवश्यक और परम सौभाग्य की बात है। हम अपनी विश्व प्रसिद्ध संस्कृति के विरुद्ध आचरण करने लगे हैं। ऐसे आचरण के कुछ दुष्परिणाम तुरन्त दिखने लगते हैं और अनेक ऐसे दुष्परिणाम होते हैं जिनका असर दूरगामी तथा व्यापक होता है।

एक परिवार में हर उम्र के लोगों के लिए कोई न कोई उपयुक्त काम होता है। यह आवश्यक नहीं कि हर कार्य का मूल्यांकन आर्थिक लाभ के रूप में ही हो। हमारी संस्कृति के विकास के साथ-साथ ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’ की भावना निरन्तर बलवती हुई है। संयुक्त परिवारों के टूटने के मूल में स्वार्थ, मेरा-तेरा की भावना, संकुचित विचार आदि के अलावा उपयोगितावाद की प्रमुख भूमिका रही है। आज भी ऐसे अनगिनत सुखी परिवार ऐसे हैं जिनपर माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और परिवार के अन्य बुजुर्गों की छत्रछाया बनी हुई है। उनको पर्याप्त सम्मान मिलता है। उनकी सलाह को माना जाता है। इसका सुखद प्रभाव परिवार के बच्चों पर भी पड़ता है। ऐसे परिवारों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। इसके लि स्वकेन्द्रित होने की भावना को छोड़ना होगा।

अपने घरों में बुजुर्गों की स्थिति देखने में कुछ समय लगाएं और स्वयं उचित अनुचित का आकलन करें। आवश्यकतानुसार उपयुक्त आचरण कर अपने व्यवहार में बदलाव लाएं। प्रेम, धैर्य, निष्ठा आदि के साथ अपने बड़ों की सेवा करें। परिवार के अर्थ को मै-मेरी पत्नी-मेरे बच्चे से आगे बढ़कर व्यापक बनाएं। जैसे उन्होंने अपनी सामर्थ्य या उससे आगे बढ़कर हमारा ध्यान रखा, हमें सामर्थवान बनाया वैसे ही हमें अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। हम उनका ऋण नहीं चुका सकते पर उन्हें सुख पहुंचाने का यथासम्भव प्रयास तो कर ही सकते हैं।

आज वृद्धाश्रम आदि के विकल्प अपनाए जाने की भी आवश्यकता है। जिस प्रकार किसी छोटे बच्चे को गोद लेकर पालन-पोषण कर पढ़ा-लिखाकर बड़ा करते हैं, वैसे ही जिनके माता-पिता नहीं हैं वे चाहें तो ‘माता’ या ‘पिता’ या दोनों को गोद लेकर उनकी सेवा कर संतुष्टि पा सकते हैं। यों यह काम कर पाना आसान नहीं है पर यदि ठान लिया जाए तो अधिक मुश्किल भी नहीं है। इतना सम्भव न हो तो अपने कीमती समय का कुछ भाग अकेले रह रहे बुजुर्गों के साथ बिताना और उनकी सहायता करना भी अनूठा सुख देगा। उनके सुख के लिए यथाशक्ति और यथासम्भव प्रबन्ध भी किया जा सकता है।

ऐसे अनेक वृद्धजन हैं जिनकी नालायक सन्तानों ने उनके धन-संपत्ति पर अनुचित तरीके से कब्जा कर उन्हें दूध से मक्खी की भांति निकालकर फैंक दिया है। उन्हें अनेक प्रकार से कष्ट पहुंचाए हैं। ऐसे ही कुछ बुजुर्ग विवश होकर न्याय पाने के लिए अपनी ही औलाद के विरुद्ध अदालत की शरण में से पहुंचे हैं। यह स्थिति सचमुच शर्मनाक है। अनेक परिवार ऐसे हैं जिनमें पति-पत्नी दोनों ही नौकरी या व्यवसाय करते हैं। विशेष रूप से ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की उपस्थिति की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

Saturday, June 5, 2010

जातपांत

जात गिनाना ही मनुवाद है


जन-गणना में जात को घुसाना सबसे बड़ा 'मनुवाद' है| यह हमारे संविधान का संपूर्ण नकार है| हमारा संविधान जातिविहीन समाज का उद्रघोष करता है लेकिन जो जात का जहर घोलने पर अमादा हैं, उनका आदर्श भारत का संविधान नहीं, 'मनुस्मृति' है| उनका जातिवाद उन्हें भस्मासुर बना देगा| वंचितों के मलाईदार नेता अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| उनकी जातियों के ही दबे-पिसे लोग उनकी छाती पर चढ़ बैठेंगे|


जन-गणना में जाति गिनाने के पक्ष में अजीबो-गरीब तर्क दिए जा रहे हैं| पहला तर्क यह है कि जाति हिंदुस्तान की सच्चाई है| इसे आप स्वीकार क्यों नहीं करते ? यह तर्क बहुत खोखला है, क्योंकि इस देश में जाति ही नहीं, अन्य कई सच्चाइयाँ हैं| क्या हम उन सब सच्चाइयों को स्वीकार कर लें ? जैसे भारत में हिंदुओं की संख्या सबसे ज्यादा है तो हम इसे हिंदू राष्ट्र घोषित क्यों न कर दें ? भारत में भ्रष्टाचार पोर-पोर में बसा हुआ है तो हम भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय शिष्टाचार की मान्यता क्यों न दे दें ? राजनीति का उद्देश्य वास्तविकताओं के सामने घुटने टेकना नहीं है बल्कि उनको बदलना है| डॉ. आंबेडकर और डॉ. लोहिया ने जो जातिविहीन समाज का सपना देखा था, उसे हमने कहां तक आगे बढ़ाया है ?

1931 के बाद अंग्रेज ने और आजाद भारत की सरकारों ने भी जात की गिनती नहीं की, इसके बावजूद भारत में जात जिंदा है, इसमें शक नहीं लेकिन वह राजनीति में जितनी जिंदा है, उतनी हमारे सामाजिक और शैक्षणिक जीवन में नहीं है| अस्पृश्यता काफी घटी है, सहभोज तो आम बात है और अंतरजातीय विवाह पर अब पहले-जैसा तूफान नहीं उठता है| ज्यों-ज्यों शिक्षा और संपन्नता फैलती जा रही है, जात का असर घटता जा रहा है लेकिन जातिवादी नेताओं के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है| वे अपने वोट बैंक को फेल नहीं होने देना चाहते| इसीलिए जन-गणना में वे जात को जुड़वाने पर आमादा हैं| उनका अपने चरित्र्-बल, बुद्घिबल और सेवा-बल पर से विश्वास उठ गया है| वे केवल अपने जातीय संख्या-बल पर निर्भर होते चले जा रहे हैं| वे सवर्ण नेताओं की भद्दी कॉर्बन कॉपी बन गए हैं| वे देश के वंचितों के प्रति उतने ही निर्मम हैं जितने कि सवर्ण नेतागण !

जन-गणना में जात गिनाने से उन्हें क्या मिलेगा ? आरक्षण तो बढ़ना नहीं है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 50 प्रतिशत की लक्ष्मण रेखा खींच रखी है| इस समय कुल आरक्षण 49.5 प्रतिशत है ! यदि आरक्षित जातियों की जनसंख्या दस-बीस करोड़ ज्यादा भी निकली तो उसका फायदा क्या है ? कुछ नहीं| कम निकलीं तो उलझनें ही उलझनें हैं| यह ठीक है कि अपने जातीय अनुपात के आधार पर नेता लोग राज-काज में अपना हिस्सा मांगेंगे| यदि दलित, आदिवासी और पिछड़े मांगेंगे तो क्या सवर्ण चुप बैठेंगे ? हर वर्ण में सैकड़ों-हजारों जातियॉं हैं, उनमें भी उप-जातियाँ हैं और उप-जातियों में गोत्र् हैं| भारत का सारा राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा हजारों टुकड़ों में बंट जाएगा| मजहब ने देश के दो टुकड़े किए थे, जाति इसे हजार टुकड़ों में बांट देगी| सवर्णों और अवर्णों के बीच तो तलवारें खिंचेंगी ही, जातियों के अंदर अंदरूनी महाभारत भी छिड़ जाएगा|

जन-गणना में जात को घुसाना सबसे बड़ा 'मनुवाद' है| यह हमारे संविधान का संपूर्ण नकार है| हमारा संविधान जातिविहीन समाज का उद्रघोष करता है लेकिन जो जात का जहर घोलने पर अमादा हैं, उनका आदर्श भारत का संविधान नहीं, 'मनुस्मृति' है| उनका जातिवाद उन्हें भस्मासुर बना देगा| वंचितों के मलाईदार नेता अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| उनकी जातियों के ही दबे-पिसे लोग उनकी छाती पर चढ़ बैठेंगे|

देश के 70-80 करोड़ वंचितों को पहली बार पता चल रहा है कि पांच-सात हजार सरकारी नौकरियों पर उनकी जाति के सिर्फ मलाईदार लोग हाथ साफ करते हैं| शेष सभी लोग अज्ञान, अभाव और अपमान का जीवन जीते हैं| उनके लिए न तो सवर्ण नेताओं ने कोई ठोस काम किया और न ही अ-वर्ण नेताओं ने| नौकरियों का आरक्षण पाखंड सिद्घ हुआ| इस पाखंड को बनाए रखने के लिए और करोड़ों वंचितों की आंखों में धूल झोंकने के लिए अब जनगणना में जाति का शोशा छोड़ा गया है|

जाति की गिनती को यह कहकर जायज़ ठहराया जा रहा है कि आपको आंकड़ों से क्या परहेज़ है ? बिना सही आंकड़ों के आप वैज्ञानिक विश्लेषण कैसे करेंगे? ऐसा तर्क करनेवालों से कोई पूछे कि जाति गिनाने में कौनसी वैज्ञानिकता है? सामाजिक और आर्थिक न्याय देने के लिए क्या जानना जरूरी है? जात या जरूरत? जिसे भी जरूरत है, उसे बिना किसी भेदभाव के विशेष अवसर दिया जाना चाहिए लेकिन जात के आधार पर विशेष अवसर देना तो ऐसा है, जैसे कोई अंधा रेवड़ी बांट रहा हो या कोई नौसिखिया वैद्य हर रोगी को दस्त की दवा टिका देता हो| किसका क्या रोग है, यह जाने बिना इस देश में 60 साल से थोक में दवा बंट रही है| इसीलिए मज़र् बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की गई|

कोई यह बताए कि कालेलकर और मंडल आयोगों ने कैसे तय किया कि ये 2300 जातियाँ पिछड़ी हैं? उन्होंने भी उन जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाने की कोशिश की| कैसे की? आंकड़े इकट्रठे किए| आधे-अधूरे किए लेकिन किए| अब भी करें और ज्यादा करें| गहरे में उतरें और उन आकड़ों के आधार पर समस्त वंचितों को सचमुच विशेष अवसर दें| 50 नहीं, 60 प्रतिशत दें, जैसा कि डॉ. लोहिया कहा करते थे लेकिन यहां जात का क्या काम है? उसे बीच में क्यों घसीट रहे है? संविधान में कहीं भी 'जाति' शब्द नहीं है, पिछड़ा वर्ग है| क्या जाति और वर्ग एक ही है? उस समय जात का सहारा इसलिए लिया गया कि यह रास्ता आसान था| दो साल में कालेलकर और सवा दो साल में मंडल क्रमश: 40 करोड़ और 70 करोड़ लोगों का कूट-परीक्षण कैसे करते? छह-सात हजार जातियों का वैज्ञानिक विश्लेषण असंभव था| इसीलिए उन्होंने जाति का अवैज्ञानिक ही सही, सरल और थोक पैमाना अपना लिया| अब लाखों सरकारी कर्मचारी जन-गणना के लिए उपलब्ध हैं और यह कंप्यूटर का ज़माना है| हम देश के वंचितों की सही और सीधी पहचान क्यों नहीं करते? उस पहचान के आधार पर एक क्रांतिकारी समतामूलक समाज की स्थापना क्यों नहीं करते?

हमारे पिछड़े नेता कहते हैं कि हर नागरिक के पहचान पत्र् में उसकी जात लिखो| यह उनके मनुवाद का निकृष्टतम रूप होगा| जात के नाम पर हम अपने भाइयों को कहां तक अपमानित करेंगे ? भारत सरकार ने तो मतदाता-सूचियों से जातिगत नाम हटा रखे हैं| लेकिन जातिवादी नेताओं के टेके से चल रही यह सरकार ज़रा घबरा गई है| प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बधाई के पात्र् हैं कि उन्होंने हिम्मत दिखाई और सारा मामला दुबारा खोल दिया| इस मुद्दे पर जमकर राष्ट्रीय बहस चलनी चाहिए| भास्कर के दिल्ली संस्करण (11 मई) में 'मेरी जाति, सिर्फ हिंदुस्तानी' लेख छपने के बाद 'सबल भारत' नामक संगठन ने आंदोलन छेड़ दिया है| उसे देश के कोने-कोने से समर्थन मिल रहा है| इस आंदोलन के आयोजकों में अनेक दलित और वंचित वर्गों के शीर्ष लोग भी शामिल हैं| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सिखों की शिरोमणि सभा, बाल ठाकरे तथा कई अन्य सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों ने इसका समर्थन किया है| अमिताभ बच्चन ने भी अपने ब्लॉग पर 'मेरी जाति भारतीय' लिख दिया है| जन-गणना में जाति को घुसाने का विरोध उतनी ही तन्मयता से होना चाहिए, जैसे कि 1857 में अंग्रेज का हुआ था| यदि हमारे नेतागण इस राष्ट्रविरोधी मांग के आगे घुटने टेक दें तो भारत के नगारिक जाति के कॉलम को खाली छोड़ दें या लिखवाएँ 'मेरी जाति हिंदुस्तानी'!

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

dr.vaidik@gmail.com


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