मैया मेरी

कीर्तन
एक बात मैया मेरी याद रखना... • मन्जू गोपालन/श्री सनातन धर्म महिला समिति, कीर्तन स्थान: बाग मुज़फ़्फ़र खां, आगरा यहां क्लिक करके यू ट्यूब पर देखिए मैया मेरी

Tuesday, October 21, 2014

दिवाली

मनाइए दीपावली
इस वर्ष 23 अक्टूबर 2014, गुरुवार को दीपावली मनयी जाएगी। इस दिन चित्रा नक्षत्र रहेगा, इसका स्वामी मंगल है। दीपावली की शाम को सूर्य, शनि, शुक्र एवं चंद्रमा एक साथ तुला राशि में स्थित रहेंगे। सूर्य नीच राशि में एवं शनि, बुध-गुरु उच्च राशि में रहेंगे। शुक्र स्वराशि एवं राहु-मंगल मित्र राशि में गोचर करेंगे। इन ग्रह योगों के कारण दीपावली शुभ और मंगलदायक रहेगी। सूर्य के साथ शनि तुला राशि में रहेगा। शनि उच्च एवं सूर्य नीच का रहेगा। ऐसा योग अब 27 वर्षों बाद 2041 में बनेगा।
1954 में बना था ऐसा योग
गुरु एवं शनि के उच्च राशि में रहते हुए दीपावली का ये योग 1954 में बना था। उस समय मंगल भी मकर राशि में उच्च का था एवं इस वर्ष 2014 में वह मित्र राशि धनु में स्थित रहेगा। आने वाले समय में दीपावली पर गुरु एवं शनि एक साथ 616 वर्षों बाद 2630 में उच्च के रहेंगे।
दिल्ली मे दीवाली पूजन का समय लाभ अमृत कि चौघडिया दोपहर के 12 बजकर 06 मिनट से दोपहर के 02 बजकर 53 मिनट तक शुभ कि चौघडिया 04 बजकर 17 मिनट से 05 बजकर 41 मिनट तक प्रदोश काल 05 बजकर 41 से 06 बजकर 53 मिनट तक वृष्भ लग्न 06 बजकर 58 मिनट से 08 बजकर 52 मिनट तक तथा रात्रि मे 1 बजकर 28 मिनट से 02 बजकर 45 मिनट तक रहेगा
देहरादून मे दीवाली पूजन का समय लाभ अमृत कि चौघडिया दोपहर के 12 बजकर 02 मिनट से दोपहर के 02 बजकर 48 मिनट तक शुभ कि चौघडिया 04 बजकर 11 मिनट से 05 बजकर 35 मिनट तक प्रदोश काल 05 बजकर 35 से 06 बजकर 47 मिनट तक वृष्भ लग्न 06 बजकर 51 मिनट से 08 बजकर 45 मिनट तक तथा रात्रि मे 1 बजकर 23 मिनट से 02 बजकर 41 मिनट तक रहेगा
मेरठ मे दीवाली पूजन का समय लाभ अमृत कि चौघडिया दोपहर के 12 बजकर 03 मिनट से दोपहर के 02 बजकर 50 मिनट तक शुभ कि चौघडिया 04 बजकर 14 मिनट से 05 बजकर 38 मिनट तक प्रदोश काल 05 बजकर 38 से 06 बजकर 50 मिनट तक वृष्भ लग्न 06 बजकर 55 मिनट से 08 बजकर 50 मिनट तक तथा रात्रि मे 1 बजकर 26 मिनट से 02 बजकर 42 मिनट तक रहेगा।
दीपावली पर करें उपाय
• दीपावली को किसी भी लक्ष्मी- विष्णु मंदिर में जाकर सुगन्धित धूप अर्पित करे तथा हृदय से धनवृद्धि करने की प्रार्थना करे। इसके पश्चात प्रत्येक शुक्रवार यह क्रिया दोहराते रहें।
• पुष्य नक्षत्र में ‘शंखपुष्पी की जड़ प्राप्त कर दीपावली के दिन इस जड़ को एक चांदी की डिब्बी में रखकर लक्ष्मी-नारायण का ध्यान करते हुये धूप दीप से पूजित करे, फिर इसे अपने कैश बाक्स या तिजोरी में रक्खें।
• दीपावली के दिन ब्रह्मदेव से अनुमति लेकर एक पीपल का पत्ता लाये फिर उसे गंगाजल से धोकर पोछकर उस पर लाल चंदन से ‘राम’ लिखे तथा कुछ मिठाई रखकर हनुमान जी को चढ़ा दें। फिर यह क्रिया माह में एक बार मंगलवार को करें।
• दीपावली को पूरे घर की सफाई करें फिर निर्धारित समय पर लक्ष्मी पूजन करें। फिर प्रत्येक अमावस्या को यह प्रक्रिया करते रहें।
• दीपावली के दिन लाल रेशमी वस्त्र में 11 छुहारे रखकर पोटली बनाकर तिजोरी में रखें।
• दीपावली के दिन से घर की छत पर प्रातःकाल प्रत्येक दिन काले तिल बिखेर दिया करें।
• दीपावली पूजन के साथ एक चांदी की डिब्बी में थोड़ा-सा सिंदूर और तीन गोमती चक्र रखकर इनका भी पूजन करें। फिर सिंदूर से पूरी डिब्बी भरकर इसको तिजोरी में पीले वस्त्र में बोधकर रखें।
• दीपावली के दिन 11 कौड़ियों को केसर से रंगकर, लक्ष्मी पूजन के साथ उन का भी पूजा करें और फिर पीले वस्त्र में बांधकर तिजोरी में रक्खें।
• पीले रेशमी वस्त्र पर 7 गोमती चक्र, 3 पूजा वाली सुपारी एवं एक मोती शंख में एक चांदी का सिक्का डालकर दीपावली के दिन पूजा स्थल पर रक्खे, लक्ष्मी पूजन के पश्चात ‘ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं’ मंत्र की एक माला जाप करें। प्रत्येक जाप पर चावल का एक अखंडित दाना मोती शंख में डालते रहें। अंतिम जाप पर यदि शंख चावल से पूर्ण न भरा हो तो अंतिम जाप में चावल से पूरा भर दें। फिर इस संपूर्ण सामग्री को रक्खे गये वस्त्र से बांधकर तिजोरी पर लटका दें।
• प० राजेश कुमार शर्मा 
भृगु ज्योतिष अनुसन्धान एवं शिक्षा केन्द्र सदर गजं बाजार मेरठ कैन्ट मोबाईल नम्बर 09359109683 दिल्ली नम्बर 9910656267

Sunday, August 17, 2014

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

जय कन्हैया लाल की!
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आपको असीम मंगलकामना!

Sunday, April 14, 2013

धोखा

शाकाहारी हो जाएं सावधान 
दैनिक उपयोग की वस्तुओं में पशु चर्बी और अन्य पशु अवयवों की मिलावट का गोरखधंधा www.youtube.com/watch?v=tgQuXz5kVHc
http://www.youtube.com/watch?v=uru3hk35S-A
निम्नलिखित ई-नम्बर्स सूअर की चर्बी (Pig Fat )को दर्शाते हैं: आप चाहे तो google पर देख सकते है इन सब नम्बर्स को:-
E100, E110, E120, E 140, E141, E153, E210, E213, E214, E216, E234, E252,E270, E280, E325, E326, E327, E334, E335, E336, E337, E422, E430, E431, E432, E433, E434, E435, E436, E440, E470, E471, E472, E473, E474, E475,E476, E477, E478, E481, E482, E483, E491, E492, E493, E494, E495, E542,E570, E572, E631, E635, E904. 
(१) सूअर/पशुओं की चर्बी/ हड्डियों का चूर्ण (पाउडर) अन्य कई दैनिक उपयोग की सामग्री के साथ-२ इन उत्पादों में भी इस्तेमाल किया जाता है:- टूथ पेस्ट , शेविंग क्रीम, चुइंगम , चोकलेट, मिठाइयाँ , बिस्किट्स , कोर्न फ्लेक्स, केक्स, पेस्ट्री, कैन/टीन के डिब्बों में आने वाले खाद्य पदार्थ फ्रूट टिन, साबुन. मैगी, कुरकुरे, खतरनाक खानपान को जानिए और सभी को बताइए | अधिकतर चॉकलेट Whey Powder से बनाई जाती हैं|
(2) Cheese बनाने की प्रक्रिया में Whey Powder एक सहउत्पाद है| अधिकतर Cheese भी युवा स्तनधारियों के Rennet से बनाया जाता है| Rennet युवा स्तनधारियों के पेट में पाया जाने वाला एंजाइमों का एक प्राकृतिक समूह है जो माँ के दूध को पचाने के काम आता है| इसका उपयोग Cheese बनाने में होता है| अधिकतर Rennet को गाय के बछड़े से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि उसमे गाय के दूध को पचाने की बेहतर प्रवृति होती है| (मित्रों यहाँ Cheese व पनीर में बहुत बड़ा अंतर है, इसे समझें|) आजकल हम भी बच्चों के मूंह चॉकलेट लगा देते हैं, बिना यह जाने की इसका निर्माण कैसे होता है? दरअसल यह सब विदेशी कंपनियों के ग्लैमर युक्त विज्ञापनों का एक षड्यंत्र है| जिन्हें देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इनके मोह में ज्यादा पड़ते हैं| आजकल McDonald, Pizza Hut, Dominos, KFC के खाद्य पदार्थ यहाँ भारत में भी काफी प्रचलन में हैं| तथाकथित आधुनिक लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए इन जगहों पर बड़े अहंकार से जाते हैं| कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपनी Birth Day Party दोस्तों के साथ यहाँ न मनाएं तो इनकी नाक कट जाती है| वैसे इन पार्टियों में अधिकतर लडकियां ही होती हैं क्योंकि लड़के तो उस समय बीयर बार में होते हैं| मैंने भी अपने बहुत से मित्रों व परिचितों को बड़े शौक से इन जगहों पर जाते देखा है, बिना यह जाने कि ये खाद्द सामग्रियां कैसे बनती हैं?
(3) यहाँ जयपुर में ही मांस का व्यापार करने वाले एक व्यक्ति से एक बार पता चला कि किस प्रकार वे लोग मांस के साथ साथ पशुओं की चर्बी से भी काफी मुनाफा कमाते हैं| ये लोग चर्बी को काट काट कर कीमा बनाते हैं व बाद में उससे घी व चीज़ बनाते हैं| मैंने पूछा कि इस प्रकार बने घी व चीज़ का सेवन कौन करता है? तो उसने बताया कि McDonald, Pizza Hut, Dominos आदि इसी घी व चीज़ का उपयोग अपनी खाद्य सामग्रियों में करते हैं वे इसे हमसे भी खरीदते हैं|
(4) इसके अलावा सूअर के मांस से सोडियम इनोसिनेट अम्ल का उत्पादन होता है, जिससे भी खाने पीने की बहुत सी वस्तुएं बनती हैं| सोडियम इनोसिनेट एक प्राकृतिक अम्ल है जिसे औद्योगिक रूप से सूअर व मछली से प्राप्त किया जाता है| इसका उपयोग मुख्यत: स्वाद को बढाने में किया जाता है| बाज़ार में मिलने वाले बेबी फ़ूड में इस अम्ल को उपयोग में लिया जाता है, जबकि १२ सप्ताह से कम आयु के बच्चों के भोजन में यह अम्ल वर्जित है|
(5) इसके अतिरिक्त विभिन्न कंपनियों के आलू चिप्स व नूडल्स में भी यह अम्ल स्वाद को बढाने के लिए उपयोग में लाया जाता है| नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्ट मेकर के पैकेट पर इसमें उपयोग में लिए गए पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा होता| Maggi कंपनी का तो यह कहना था कि यह हमारी सीक्रेट रेसिपी है| इसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते|
(6) चुइंगम जैसी चीज़ें बनाने के लिए भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग किया जाता है| इस प्रकार की वस्तुओं को प्राकृतिक रूप से तैयार करना महंगा पड़ता है अत: इन्हें पशुओं से प्राप्त किया जाता है|
(7) Disodium Guanylate (E-627) का उत्पादन सूखी मछलियों व समुद्री सेवार से किया जाता है, इसका उपयोग ग्लुटामिक अम्ल बनाने में किया जाता है|
(8) Dipotassium Guanylate (E-628) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग स्वाद बढाने में किया जाता है|
(9) Calcium Guanylate (E-629) का उत्पादन जानवरों की चर्बी से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|
(10) Inocinic Acid (E-630) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|
(11) Disodium Inocinate (e-631) का उत्पादन सूअर व मछली से किया जाता है, इसका उपयोग चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने व स्वाद बढाने में किया जाता है|
(12) इन सबके अतिरिक्त शीत प्रदेशों के जानवरों के फ़र के कपडे, जूते आदि भी बनाए जाते हैं| इसके लिए किसी जानवर के शरीर से चमड़ी को खींच खींच कर निकाला जाता है व जानवर इसी प्रकार ५-१० घंटे तक खून से लथपथ तडपता रहता है| तब जाकर मखमल कोट व कपडे तैयार होते हैं और हम फैशन के नाम पर यह पाप पहने मूंह उठाए घुमते रहते हैं| यह सब आधुनिकता किस काम की? ये सब हमारे ब्रेनवाश का परिणाम है, जो अंग्रेज़ कर गए| बेईमान लोगों ने आज अपनी सारी सीमाएं लांघ दी हैं सामाजिक जीवन में हिंसा और मांसाहार का बोलबाला है. जो शाकाहारी हैं उनको जाने-अनजाने मांसाहार करने को मजबूर किया जा रहा है. दैनिक उपयोग की वस्तुओं में पशु चर्बी और अन्य पशु अवयवों की मिलावट का गोरखधंधा बिना रोकटोक के जारी है और आम आदमी असहाय सा खड़ा दूसरों को ताक रहा है और सोच रहा है कि कोई तो आएगा जो इस षड्यंत्र को रोकेगा. जीवन की भागदौड़ में लोग इतने उलझे हैं कि उन्हें इस सब के बारे में सोचने की फुर्सत ही नहीं है. यदि आप ऐसे लोगों को बताएँ कि अमुक वस्तु में किसी जानवर की चर्बी,खून या अन्य कोई पशु अंग मिलाया गया है या जानवर या किसी निरीह पक्षी को मारकर या कठोर पीड़ा देकर फलां सौंदर्य प्रसाधन (कोस्मैटिक ) बनाया गया है तो उनके जवाब मन को बड़ी पीड़ा पहुँचाने वाले होते हैं : भारत में खाद्य-सामग्री पर हरा वृत्त ‘ग्रीन सर्कल’ (शाकाहार के लिए )/ कत्थई वृत्त ‘ब्राउन सर्कल’ (मांसाहार के लिए ) निशान लगाने का क़ानूनी नियम है ताकि ग्राहक को पता चल सके कि अमुक आइटम शाकाहारी है या मांसाहारी. पर इस क़ानूनी नियम का भी दुरूपयोग किया जा रहा है, बड़ी-बड़ी और नामी कम्पनियाँ भी इसमें शामिल हैं, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई कदम उठाया गया हो, ऐसा सुनने-पढ़ने में नहीं आया, जबकि अक्सर समाचार-पत्रों, टी.वी में पढ़ने-सुनने में आता रहता है कि चोकलेट -बिस्किट-चिप्स-वेफर्स आदि में पशु चर्बी-अंग आदि मिलाये जाते हैं और हम शाकाहारी हरा निशान देखकर ऐसे डिब्बाबंद खाद्यपदार्थ उपयोग में ले लेते हैं जबकि ई-नम्बर्स (ये संख्याएँ यूरोप में डिब्बाबंद खाद्य-सामग्री (पैक्ड फ़ूड आइटम्स) के अवयव (घटक पदार्थ) दर्शाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं) की छानबीन की जाए तो पता चलता है कि फलां आइटम तो मांसाहारी है. यह तो एक तरह का षड्यंत्र है, धोखा है, उपभोक्ता की धार्मिक भावनाओं का मखौल उड़ाने जैसा है. जो कम्पनियाँ और व्यक्ति ऐसा कर रहे हैं उनके विरुद्ध सरकार को कठोर कदम उठाने चाहिए और शाकाहार-अहिंसा में विश्वास रखने वाली भारत की आम जनता को ऐसी कंपनियों का पूर्ण बहिष्कार कर देना चाहिए. हम अनुरोध करते हैं कि आप जब भी कुछ खरीदे, उसके घटक (ingredients) अवश्य जांच लें|
साभार: स्वदेशी अपनाओ देश बचाओ

Thursday, January 24, 2013

ढोलक

ढोलक की गूंज
आइए, कुछ देर ढोलक सुनें।
वादक मंजू गोपाल
अध्यक्ष, श्री सनातन धर्म महिला समिति, नयी दिल्ली-५९ भजन-कीर्तन: http://bhajankeertan.blogspot.in/

Friday, January 11, 2013

साई

साई बोल मूरख
हाल ही में हमारे क्षेत्र में एक जुलूस निकला- अंग्रेजी बैण्ड बाजों के साथ। आगे एक वाहन में गणेशजी की प्रतिमा, उसके पीछे साई बोल कहती ज्यादा महिलाएं-लड़कियां और कुछ पुरुष फ़िर साई बाबा की प्रतिमा। ऐसे द्रूश्य तमाम बस्तियों में साई के व्यवसाय के प्रचार के रूप में दिखाई दे जाते हैं। यहीं अक्सर ऐसे छोटे-बड़े जुलूस निकलते रहते हैं। हिन्दू धन्य होते हैं कि उन्हें एक और संकटमोचक (?) मिल गया। कारण, साई को राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि देवताओं के साथ नत्थी कर दिया गया है, जैसे- ॐ साई राम।  इस आशय के तमाम चित्र नेट पर मौजूद हैं। साई महिमा की तमाम कहानियां प्रचलित की गई हैं। कुछ टीवी चैनल भी इस धन्धे में शामिल हैं। फ़िल्म-डॉल्यूमेण्टरी बन गयीं। तमाम ब्लॉग-वेबसाइटें मौजूद हैं। फ़ुटपाथ-जमीनों पर कब्जजा कर उसके मन्दिर बनाए जा रहे हैं। यही नहीं लालची लोग हिन्दू मन्दिरों में साई की मूर्तियां स्थापित कर लोगों की अन्ध श्रद्धा से धन्धा बढ़ाने में लगे हुए हैं। साई की मूर्ति मन्दिर में होन एक फ़ैशन का रूप ले चुका है। सनातन धर्म के भजन-कीर्तनों में साई भजन की फ़रमाइश भी उठती है। जमकर महिमामण्डन हो रहा है। मूर्ख बनाया जा रहा है और हम खुशी-खुशी बन भी रहे हैं।















शिरडी के साई
साभार/लिन्क: https://hindurashtra.wordpress.com/2012/04/12/shirdi-sai-baba/
संत वही होता है जो लोगो को भगवान से जोड़े , संत वो होता है जो जनता को भक्तिमार्ग की और ले जाये , संत वो होता है जो समाज मे व्याप्त बुराइयों को दूर करने के लिए पहल कर इस साई नाम के मुस्लिम पाखंडी फकीर ने जीवन भर तुम्हारे राम या कृष्ण का नाम तक नहीं लिया और तुम इस साई की काल्पनिक महिमा की कहानियों को पढ़कर इसे भगवान मान रहे हो। कितनी भयावह मूर्खता है ये! महान ज्ञानी ऋषि-मुनियो के वंशज आज इतने मूर्ख और कलुषित बुद्धि के हो गए हैं कि उन्हें भगवान और एक साधारण से मुस्लिम फकीर में फर्क नज़र नहीं आता ? जब आज तक कभी कोई मुस्लिम तुम्हारे शिवलिंग पर दूध या जल चढ़ाने नहीं आया, कभी तुम्हारे हनुमान जी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाने नहीं आया, कभी तुम्हारे विष्णु जी पर तुलसी-दल या असंख्यों मंदिरो में स्थापित मूर्तियों पर पुष्प चढ़ाने नहीं आया तो तुम किस मुंह से सडी़ हुयी लाशों के ऊपर बनी कब्रों,दरगाहों और मजारों पर चादर चढ़ाने पहुच जाते हो? शरम नहीं आती। वो तुम्हारे भगवान को गालिया देते है, निंदा करते है और दिन मे एक दो नहीं पाँच पाँच बार मस्जिद से साफ साफ चिल्लाते हैं कि एकमात्र ईश्वर अल्लाह है और कोई है ही नहीं। तो तुम्हें सुनाई नहीं देता क्या। या फिर तुम्हारी ऐसी कौन सी इच्छा है जो कि हमारे परमकृपालु, दयालु ,भक्तवत्सल भगवान पूरी कर ही नहीं सकते, उसे या तो सड़े हुये मुर्दे की हड्डिया पूरा कर सकती है, या फिर शिरडी मे जन्मा एक मुस्लिम फकीर साई! आखिर जाते क्यों हो? जब तुम्हारी प्यास भगवान रूपी गंगाजल से नहीं बुझ रही तो दरगाह और साई रूपी कुंए के पानी से कैसे बुझ जाएगी? गंगाजल को छोडकर कीचड़ की ओर भागने वाले कितने महामूर्ख होते हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन अंधभक्तों को दुनिया भर के तर्क, तथ्य, प्रमाण तक दे दिये, यहा तक कि श्री कृष्ण भगवान द्वारा गीता में इसी विषय पर कहा गया एक श्लोक तक दिखा दिया पर इन धूर्तों की बुद्धि , कलयुग के पाप ने इतनी कुंठित और प्रदूषित कर दी है कि इन्हे समझ ही नहीं आता। गीता में श्री कृष्ण भगवान जी ने साफ साफ कहा है कि जो जिसे पूजता है वो उसे ही प्राप्त होता है यानि मरे हुये व्यक्तियों को सकाम भाव से पूजने वाला पिशाच योनि को प्राप्त होता है। ये स्वयं श्री कृष्ण ने कहा तो भी इन मूर्खो मे इतनी भी बुद्धि नहीं बची कि समझ जायें कि साई को पूजने वाले मृत्युपर्यंत पिशाच बनकर ही भटकेंगे।
तुम चाहे कितना भी साई-साई चिल्लाओ गला फाड़ फाड़ के, चाहे दरगाहों पर जाकर कितनी भी चादर चढालो, तुम श्री भगवान को तो क्या उनकी कृपा का एक अंश भी प्राप्त नहीं कर सकते। ये सत्य है साई ने ऐसा क्या कर दिया था जो तुम्हारा गला नहीं दुखता उसकी महिमा गाते गाते? अरे पूरा भारत उस समय अंग्रेज़ों के डंडे खा रहा था, साई ने बचाया था क्या? अगर वो भगवान था या संत था तो उसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी भारत माता को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए क्या किया था? उस समय श्री कृष्ण की प्रिय सर्वदेवमई गोमाताएं काटी जाती थीं उनके ऊपर साई कभी क्यों नहीं बोला? भगवान श्री कृष्ण थे, जब कंस के अनुचर गोमाताओ को ले जाने लगे तो, उन्हें मार कर परलोक पहुंचा दिया था और एक ये साई था कि हजारों गोमाताएं रोज कटती रहीं ये बचाना तो दूर उनके ऊपर कभी बोला तक नहीं? काहे का भगवान या संत था ये ? क्या इस भूमि की सनातनी संतानें इतनी बुद्धिहीन हो गयी हैं कि जिसकी भी काल्पनिक महिमा के गपोड़े सुन ले उसी को भगवान और महान मानकर भेडॉ की तरह उसके पीछे चल देती है? इसमे हमारा नहीं आपका ही फायदा है।  श्रद्धा और अंधश्रद्धा में फर्क होता है, श्रद्धालु बनो, भगवान को चुनो, राम और कृष्ण के बनो, साई के बनाकर सिर्फ भूत प्रेत बनाकर ही भटकोगे ….. जय श्री राम कृष्ण ……… जय सनातन धर्म
साई भक्तों के लिए दस प्रश्न – अगर किसी भी साई भक्त के पास इन दस प्रश्नो का उत्तर हैं तो में भी साई का भक्त बनूँगा और उत्तर नहीं है तो कृपया मेरी फ्रेंड लिस्ट से विदा लेले, सचिन शर्मा को ऐसे मित्रो की आवश्यकता नहीं है चाहे कोई भी हो कोई फालतू की बहस नहीं, कुतर्क नहीं, जिसके पास सभी प्रश्नो का सार्थक जवाब हो उत्तर दे। कोई सुझाव नहीं चाहिए और अगर इनके उत्तर नहीं है या इन्हे पढ़ने के बाद शर्म आए तो भगवान की और बढ़ो, कल्याण होग।
1 – साई को अगर ईश्वर मान बैठे हो अथवा ईश्वर का अवतार मान बैठे हो तो क्यों? आप हिन्दू हैं तो सनातन संस्कृति के किसी भी धर्मग्रंथ में साई महाराज का नाम तक नहीं है। तो धर्मग्रंथों को झूठा साबित करते हुए किस आधार पर साई को भगवान मान लिया? और धर्मग्रंथ कहते हैं कि कलयुग में दो अवतार होने है एक भगवान बुद्ध का हो चुका दूसरा कल्कि नाम से अंतिम चरण में होगा।
2 – अगर साई को संत मानकर पूजा करते हो तो क्यों? क्या जो सिर्फ अच्छा उपदेश दे दे या कुछ चमत्कार दिखा दे वो संत हो जाता है? साई महाराज कभी गोहत्या पर बोले? साई महाराज ने उस समय उपस्थित कौन सी सामाजिक बुराई को खत्म किया या करने का प्रयास किया? ये तो संत का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है और फिर संत ही पूजने हैं तो कमी थी क्या ? यह फकीर ही मिला ?
3- अगर सिर्फ दूसरों से सुनकर साई के भक्त बन गए हो तो क्यों? क्या अपने धर्मग्रंथो पर या अपने भगवान पर विश्वास नहीं रहा ?
4 – अगर मनोकामना पूर्ति के लिए साई के भक्त बन गए हो तो तुम्हारी कौन सी ऐसी मनोकामना है जो कि भगत्वतसल भगवान शिवजी या श्री विष्णु जी या कृष्ण जी या राम जी पूरी नहीं कर सकते सिर्फ साई ही कर सकता है? तुम्हारी ऐसी कौन सी मनोकामना है जो कि वैष्णो देवी या हरिद्वार या वृन्दावन या काशी या बाला जी में शीश झुकाने से पूर्ण नहीं होगी वो सिर्फ शिरडी जाकर माथा टेकने से ही पूरी होगी।
5 – तुम्हारे पूर्वज सुबह और शाम श्री राम या कृष्ण या शिव शिव ही बोलते थे फिर तुम क्यों सिर्फ प्रचार को सुनकर बुद्धि को भ्रम में डालकर साई-साई चिल्लाने लगे हो?
6 – अगर भगवान कि पूजा करनी है तो इतने प्यारे,दयालु ,कृपालु भगवान है न तुम्हारे पास फिर साई क्यों ? अगर संतों की पूजा करनी है तो साई से महान ऋषि मुनि हैं न साई ही क्यों?
7 -मुस्लिम अपने धर्म के पक्के होते है अल्लाह के अलावा किसी और की और मुंह भी नहीं करते जब कोई अपना बाप नहीं बदल सकता अथवा अपने बाप कि जगह पर किसी और को नहीं देख सकता तो तुम साई को अपने भगवान की जगह पर देखकर क्यों दुखी या क्रोधित नहीं होते?
8 -अगर सनातन धर्मी हो तो सनातन धर्म में तो कहीं साई है ही नहीं। तो आप खुद को सनातन धर्मी कहलाना पसंद करोगे या धर्मनिरपेक्षी साई भक्त?
9 – आप खुद को राम या कृष्ण या शिव भक्त कहलाने में कम गौरव महसूस करते हैं क्या जो साई भक्त होने का बिल्ला टाँगे फिरते हैं? क्या राम और कृष्ण से प्रेम का क्षय हो गया है?
10 – ॐ साई राम ॐ हमेशा मंत्रों से पहले ही लगाया जाता है अथवा ईश्वर के नाम से पहले साई के नाम के पहले ॐ लगाने का अधिकार कहां से पाया? जय साई राम श्री में शक्ति माता निहित है श्री शक्तिरूपेण शब्द है  जो कि अक्सर भगवान जी के नाम के साथ संयुक्त किया जाता है तो जय श्री राम में से श्री तत्व को हटाकर साई लिख देने में तुम्हें गौरव महसूस होना चाहिए या शर्म आनी चाहिए?
ये जो नीचे फोटो है ऐसे फोटो आजकल चोराहों पर लगाकार भगवान का खुलेआम अपमान और हिन्दुओं को मूर्ख बनाया जा रहा है? मुस्लिम साई के चक्कर में नहीं पड़ते धर्म के पक्के है सिर्फ अल्लाह हिन्दू प्रजाति ही हमेशा मूर्ख क्यो बनती है। 
जय श्री राम! जय सनातन धर्म!!

Monday, December 31, 2012

नव वर्ष

भारतीय नव वर्ष का ऐतिहासिक महत्व
१. यह दिन सृष्टि रचना का पहला दिन है। इस दिन से एक अरब ९७ करोड़ ३९ लाख ४९ हजार १०९ वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना प्रारंभ की। 
२. विक्रमी संवत का पहला दिन: उसी राजा के नाम पर संवत् प्रारंभ होता था जिसके राज्य में न कोई चोर हो, न अपराधी हो, और न ही कोई भिखारी हो। साथ ही राजा चक्रवर्ती सम्राट भी हो। सम्राट विक्रमादित्य ने २०६७ वर्ष पहले इसी दिन राज्य स्थापित किया था।
३. प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक दिवस: प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या में राज्याभिषेक के लिए चुना। 
४. नवरात्र स्थापना: शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन। 
५. गुरू अंगद देव प्रगटोत्सव: सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्म दिवस।

६. आर्य समाज स्थापना दिवस: समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
७. संत झूलेलाल जन्म दिवस: सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।
८. शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस: विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
९. युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन: ५११२ वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।
भारतीय नव वर्ष का प्राकृतिक महत्व 
१०. वर्ष प्रतिपदा: वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है जो उल्लास, उमंग, खुशी तथा चारों तरफ पुष्पों की सुगंधि से भरी होती है।
११. फसल पकने का प्रारंभ यानी किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
१२. शुभ मुहूर्त: नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हैं अर्थात् किसी भी कार्य को प्रारंभ करने के लिये यह शुभ मुहूर्त होता है।
राष्ट्र प्रेम
मोरारजी देसाई को जब किसी ने पहली जनवरी को नव वर्ष की बधाई दी तो उन्होंने उत्तर दिया था- किस बात की बधाई? मेरे देश और देश के सम्मान का तो इस नव वर्ष से कोई संबंध नहीं।
यही हम लोगों को भी समझना और समझाना होगा। क्या १ जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके  आइए, विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाएं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।
हिन्दी महीने
जिस तरह जनवरी अंग्रेज़ी का पहला महीना है उसी तरह हिन्दी महीनों में चैत वर्ष का पहला महीना होता है। हम इसे कुछ इस तरह से समझ सकते हैं-
मार्च- अप्रैल -- चैत्र (चैत)
अप्रैल- मई -- वैशाख (वैसाख)
मई- जून -- ज्येष्ठ (जेठ)
जून- जुलाई -- आषाढ़ (आसाढ़)
जुलाई- अगस्त -- श्रावण (सावन)
अगस्त- सितम्बर -- भाद्रपद (भादो)
सितम्बर- अक्टूबर -- अश्विन (क्वार)
अक्टूबर-नवम्बर -- कार्तिक (कातिक)
नवम्बर- दिसम्बर -- मार्गशीर्ष (अगहन)
दिसम्बर- जनवरी -- पौष (पूस)
जनवरी- फरवरी -- माघ
फरवरी- मार्च -- फाल्गुन (फागुन)

नव वर्ष ज़रूर मनाएं परन्तु इस बार ११ अप्रैल को हर्षोल्लास के साथ ताकि दुनिया को भी पता चले कि हमें अपनी संस्कृति जान से ज्यादा प्यारी है !
जय भारत !
• राजीव पाल/फ़ेसबुक

Tuesday, October 16, 2012

नवरात्रि

नवरात्रि के पावन अवसर पर हार्दिक मंगलकामनाएं!          
मंजू गोपालन, श्री सनातन धर्म महिला समिति, नयी दिल्ली
नवरात्रि: देवी पूजन की सही और सरल विधि
देवी कृपा पाने के सरल प्रयोग
• डॉ. रामकृष्ण डी. तिवारी
शक्ति के लिए देवी आराधना की सुगमता का कारण मां की करुणा, दया, स्नेह का भाव किसी भी भक्त पर सहज ही हो जाता है। ये कभी भी अपने बच्चे (भक्त) को किसी भी तरह से अक्षम या दुखी नहीं देख सकती है। उनका आशीर्वाद भी इस तरह मिलता है, जिससे साधक को किसी अन्य की सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ती है। वह स्वयं सर्वशक्तिमान हो जाता है।
इनकी प्रसन्नता के लिए कभी भी उपासना की जा सकती है, क्योंकि शास्त्राज्ञा में चंडी हवन के लिए किसी भी मुहूर्त की अनिवार्यता नहीं है। नवरात्रि में इस आराधना का विशेष महत्व है। इस समय के तप का फल कई गुना व शीघ्र मिलता है। इस फल के कारण ही इसे कामदूधा काल भी कहा जाता है। देवी या देवता की प्रसन्नता के लिए पंचांग साधन का प्रयोग करना चाहिए। पंचांग साधन में पटल, पद्धति, कवच, सहस्त्रनाम और स्रोत हैं। पटल का शरीर, पद्धति को शिर, कवच को नेत्र, सहस्त्रनाम को मुख तथा स्रोत को जिह्वा कहा जाता है।
इन सब की साधना से साधक देव तुल्य हो जाता है। सहस्त्रनाम में देवी के एक हजार नामों की सूची है। इसमें उनके गुण हैं व कार्य के अनुसार नाम दिए गए हैं। सहस्त्रनाम के पाठ करने का फल भी महत्वपूर्ण है। इन नामों से हवन करने का भी विधान है। इसके अंतर्गत नाम के पश्चात नमः लगाकर स्वाहा लगाया जाता है।
हवन की सामग्री के अनुसार उस फल की प्राप्ति होती है। सर्व कल्याण व कामना पूर्ति हेतु इन नामों से अर्चन करने का प्रयोग अत्यधिक प्रभावशाली है। जिसे सहस्त्रार्चन के नाम से जाना जाता है। सहस्त्रार्चन के लिए देवी की सहस्त्र नामावली जो कि बाजार में आसानी से मिल जाती है कि आवश्यकता पड़ती है।
इस नामावली के एक-एक नाम का उच्चारण करके देवी की प्रतिमा पर, उनके चित्र पर, उनके यंत्र पर या देवी का आह्वान किसी सुपारी पर करके प्रत्येक नाम के उच्चारण के पश्चात नमः बोलकर भी देवी की प्रिय वस्तु चढ़ाना चाहिए। जिस वस्तु से अर्चन करना हो वह शुद्ध, पवित्र, दोष रहित व एक हजार होना चाहिए। अर्चन में बिल्वपत्र, हल्दी, केसर या कुंकुम से रंग चावल, इलायची, लौंग, काजू, पिस्ता, बादाम, गुलाब के फूल की पंखुड़ी, मोगरे का फूल, चारौली, किसमिस, सिक्का आदि का प्रयोग शुभ व देवी को प्रिय है। यदि अर्चन एक से अधिक व्यक्ति एक साथ करें तो नाम का उच्चारण एक व्यक्ति को तथा अन्य व्यक्तियों को नमः का उच्चारण अवश्य करना चाहिए।
अर्चन की सामग्री प्रत्येक नाम के पश्चात, प्रत्येक व्यक्ति को अर्पित करना चाहिए। अर्चन के पूर्व पुष्प, धूप, दीपक व नैवेद्य लगाना चाहिए। दीपक इस तरह होना चाहिए कि पूरी अर्चन प्रक्रिया तक प्रज्वलित रहे। अर्चनकर्ता को स्नानादि आदि से शुद्ध होकर धुले कपड़े पहनकर मौन रहकर अर्चन करना चाहिए।
इस साधना काल में आसन पर बैठना चाहिए तथा पूर्ण होने के पूर्व उसका त्याग किसी भी स्थिति में नहीं करना चाहिए। अर्चन के उपयोग में प्रयुक्त सामग्री अर्चन उपरांत किसी साधन, ब्राह्मण, मंदिर में देना चाहिए। कुंकुम से भी अर्चन किए जा सकते हैं। इसमें नमः के पश्चात बहुत थोड़ा कुंकुम देवी पर अनामिका-मध्यमा व अंगूठे का उपयोग करके चुटकी से चढ़ाना चाहिए।
बाद में उस कुंकुम से स्वयं को या मित्र भक्तों को तिलक के लिए प्रसाद के रूप में दे सकते हैं। सहस्त्रार्चन नवरात्र काल में एक बार कम से कम अवश्य करना चाहिए। इस अर्चन में आपकी आराध्य देवी का अर्चन अधिक लाभकारी है। अर्चन प्रयोग बहुत प्रभावशाली, सात्विक व सिद्धिदायक होने से इसे पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से करना चाहिए।
साभार: लिन्क  वेबदुनिया

Friday, August 10, 2012

जय श्री कृष्ण

जय कन्हैया लाल की!
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर आपको हार्दिक बधाई!

इस वर्ष श्री सनातन धर्म महिला समिति द्वारा चाणक्य प्लेस में श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन किन्हीं कारणों से नहीं किया जा सका है जिसका मुझे बड़ा कष्ट अनुभव हो रहा है। श्री कृष्ण भक्त क्षमा करें। श्री कृष्ण की इच्छा और कृपा हुई तो यह आयोजन फ़िर हर बरस यहां होगा।
जय श्री कृष्ण!
मन्जू गोपालन, अध्यक्ष, श्री सनातन धर्म महिला समिति

Tuesday, October 25, 2011

Saturday, March 19, 2011

होली

होलिका दहन
होली की शुभकामना!

Saturday, February 26, 2011

दयानन्द सरस्वती

महर्षि दयानन्द को नमन
(187वां जन्मोत्सव, 27 फ़रवरी 2011)
दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी।उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। 
उन्नीसवीं सदी में चारों ओर अराजकता का बोलबाला था। नर हत्या को खेल समझने वाले ठगों के आतंक से जनता सदा त्रस्त रहती थी। सामाजिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि चार आश्रमों और चार वर्णों की दृढ़ नींव पर टिके समाज की एक-एक चूल हिल रही थी। छुआछूत ने समाज को हजारों भागों में बांट दिया था। कन्याओं को गला घोंटकर मार दिया जाता था। विधवाओं को ढोल-धमाकों के साथ जबर्दस्ती सती कर देने को परम धर्म समझा जाता था। हजारों वर्ष के अपने पतन के सिलसिले को देखकर भारत मां खून के आंसू रो रही थी। ऐसे घनघोर अंधेरे में अचानक एक बिजली सी चमकी, रेगिस्तान में जैसे अमृत की धारा बह गयी। भारत मां को एक लाल मिल गया जिसको महर्षि दयानन्द सरस्वती के नाम से जाना जाता है।
सन्‌ 1824 में फ़ाल्गुन कृष्ण पक्ष दशमी को गुजरात में टंकारा ग्राम में श्रीकृष्ण जी के घर एक बालक का जन्म हुआ जिसका नाम मूलशंकर रख गया। बाद में शिक्षा व योग्यता के आधार पर विद्वानों ने इनको दयानन्द सरस्वती नाम दिया। वह प्रकाश का रक्षक एवं प्रचारक था। वह प्राणी मात्र का रक्षक था। वह सांसारिक प्रलोभनों और भोगों से लोहा लेने वाला धुरन्धर योद्धा और विजेता था। दयानन्द वह महामानव थाजिसने अध्यात्म को क्रियात्मक रूप देने में अभूतपूर्व सफ़लता प्राप्त की। उन्होंने कहा था कि योगी बनो, साथ ही कर्मयोगी भी बनो।वेदों की ओर लौटो। आत्मज्ञानी बनो परन्तु मानव भी बनो। वह उन व्यक्तियों में से थे जिन्हें वेद और ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन करके देवताओं की श्रेणी में अग्रणी माना जाता था। वे मानव जाति की प्रेरणा और आदर के पात्र रहे, आज भी हैं और सदा रहेंगे।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सर्वप्रथम स्वराज्य शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने कहा था कि सुराज से स्वराज्य श्रेष्ठ है। स्वतन्त्रता संग्राम में 85% लोग उनके अनुयायी थे। कॉंग्रेस का इतिहास इस बात को प्रमाणित करता है। जितने भी शहीद हुए हैं उनके बारे में पता चलता है कि उनके प्रेरणास्रोत महर्षि दयानन्द ही थे।
अन्याय और काले धन का विरोध कर रहे योगगुरू के रूप में विख्यात बाबा रामदेव महर्षि दयानन्द सरस्वती के ही परम भक्त हैं। दयानन्द जी ने गौ हत्या का दृढ़ता से विरोध किया। अपनी पुस्तक ‘गौ करुणानिधि’ में स्पष्ट किया है कि मांस भक्षण से मानव मात्र का अपकार होता है, जीवों का पालन करने से प्राणी मात्र का उपकार होता है। स्वामी दयानन्द जी ने नारी शिक्षा आरम्भ करायी। उनको वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। आज यह महर्षि की ही देन है कि देश की महिलाएं अबला से सबला बन गयीं हैं। उन्होंने विधवाओं का पुनर्विवाह कराया। उन्होंने छुआछूत का सदा विरोध किया। वे मानते थे कि जन्म से कोई अछूत नहीं होता। स्वामी जी ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और जीव पूजा का समर्थन किया।  वे मानते थे कि भारत की गुलामी के मूल में मूर्ति पूजा ही रही है। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा पर बल दिया जिसका मुख्य नाम है ‘ओ३म्‌’ । उन्होंने लोगों को यज्ञ करने की प्रेरणा दी। उन्होंने पाखण्ड और अन्धविश्वास का हमेशा विरोध किया। शास्त्रार्थ किये। विश्वभर के विद्वानों को उनके आगे घुटने टेकने पड़े। वे एक महान्‌ योद्धा थे। उन्होंने वेदों का भाष्य हिन्दी में किया। स्वामी दयानन्द का प्रमुख ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जिसमें ईश्वर के 108 नामों की व्याखा व 1576 वेद मन्त्रों का विवरण दिया गया है।
उन्होंने सन्‌ 1875 में बम्बई (मुम्बई) में आर्य समाज की स्थापना की। आज आर्य समाज के करोड़ों सदस्य महर्षि के काम को आगे बढ़ा र्हैं। महात्मा गान्धी ने भी लिखा है- महर्षि दयानन्द सरस्वती भारत के आधुनिक ॠषियों व सुधारकों में श्रेष्ठ और अग्रणी थे। उनके कारण ही आज भारत  पुन: विश्व गुरू बनने को अग्रसर हो रहा है।
धन्य हैं ऋषि हैं आप, आपने जग जगा दिया। महर्षि दयानन्द सरस्वती के 187वें वर्ष पर हम उन्हें शत्‌शत्‌ नमन करते हैं।
• सुरेश आर्य
मन्त्री, आर्य समाज, वृन्दावन गार्डन, सहिबाबाद, उ.प्र.





Friday, February 4, 2011

धर्मान्तरित दलित

आरएल फ़्रांसिस
धर्मान्तरित दलितों का आरक्षण
दलित ईसाइयों को आरक्षण दिये जाने का मुद्दा हमारे यहां प्रायः उठता रहता है। इस मुद्दे को लेकर गैर सरकारी संगठन सेन्टर फ़ॉर पब्लिक इन्टरेस्ट लिट्टीगेशन और डी. डेविड द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं के कारण भी सबके सामने आए। इन्होंने संविधान में वर्णित अनुसूचित जाति आदेश 1950 के तीसरे पैराग्राफ की वैधानिकता को चुनौती दी। इसमें लिखा हुआ है कि हिन्दू, सिख, और बौद्ध के अलावा अन्य धर्म का पालन करने वाला अनुसूचित जाति का सदस्य आरक्षण से वंचित हो जाएगा।

दलित ईसाइयों को नौकरियों में आरक्षण देना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्यायालय की एक अन्य व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रपति के आदेश के अन्तर्गत अनुसूचित जाति और जनजाति की श्रेणियों में प्रविष्टियों के इस अन्तिम रूप में छेड़छाड़ नहीं की जा सकती। याचिकाकर्ताओं ने तर्क रखा कि न्यायालय द्वारा दी गयी व्यवस्थाएं छुटपुट सामग्री और तथ्यों पर आधारित है। परन्तु अब दलित ईसाइयों को आरक्षण का लाभ देने के पक्ष में व्यापक तथ्य और सामग्री जुटा ली गयी है। अतः अब इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पिछड़े और उपेक्षित धर्मांतरित ईसाइयों के एक बड़े वर्ग का मिशनवाद और पादरियों के विरुद्ध अभियान भी काफी समय से चल रहा है। इससे जुड़ी अनेक बातें मुझे कुछ समय पहले पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेण्ट के अध्यक्ष आर. एल. (राम लुभाया) फ्रांसिस ने एक मुलाकात में बतायी थीं। फ्रांसिस वर्षों से इन मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं।

चर्च संगठनों के भीतर ही समान अधिकारों के लिए उनकी लड़ाई जारी है। दलित ईसाइयों के लिए आरक्षण की वकालत की जा रही है जबकि इसकी जरूरत ही नहीं है। धर्मान्तरित ईसाइयों के प्रति ईमानदारी निभायी जाए तो उन पर धर्मान्तरण के बाद भी ‘दलित’ का ठप्पा लगाये रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दरअसल आदिवासी या वनवासी समुदाय में घुसपैठ बनाने में मिशनरी जितने सफल हुए हैं उतने हिन्दू दलितों में नहीं। फिर भी बड़ी संख्या में उनका विभिन्न प्रकार के तरीके अपनाकर लम्बे समय से धर्मान्तरण कराया जा चुका है और प्रयास जारी हैं। हिन्दू संगठन इसका निरन्तर विरोध भी करते रहे हैं। यही नहीं धर्मान्तरण पर रोक को लेकर कठोर कानून बनाये जाने की मांग भी लगातार उठती रहती है। 
चर्च और कॉंग्रेस दोनों ही हिन्दू संगठनों और भारतीय जनसंघ तथा आज की भारतीय जनता पार्टी का भय दिखाकर लोगों को अपने पक्ष में कर वोट बटोरते रहे हैं। जबकि आश्चर्य की बात यह है कि राजग के शासन के दौरान इस अल्प संख्यक समुदाय को किसी प्रकार की हानि नहीं हुई। मिशनरी लोगों को विश्वास में लिए बिना उनके निजी कानूनों में परिवर्तन करने में जुटे रहे हैं। यह बात उल्लेखनीय है कि लगभग 95 प्रतिशत लोगों को अपने अधिकारों और कानूनों के बारे में जानकारी ही नहीं है। मिशनरियों को छुटपुट घटनाओं को भी काफी बढ़ाचढ़ाकर अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने में गहरी रुचि रहती है। धन, अंधविश्वास, लालच, भय, सेवा, शिक्षा आदि का उपयोग करते हुए लम्बे समय से वे इस देश के नागरिकों को अपने समाज और अपने लोगों से काटकर कौन से पुण्य का काम कर रहे हैं। जाहिर है उनके ऐसे कार्य के विरुद्ध कभी-कभी हलकी या कठोर प्रतिक्रिया भी हो जाती है तब उन्हें अपने ऊपर हुए अत्याचार का हौआ खड़ा करने का अभियान चलाना पड़ता है।
भारतीय चर्च को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि उन्हें इस देश में बहुसंख्यक समुदाय से भी ज्यादा धार्मिक स्वतंत्रता मिली हुई है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि चर्च की विस्तारवादी मानसिकता के चलते देश के कई भागों में टकराव की स्थिति पैदा होती रहती है। उड़ीसा के कंधमाल में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं लोग भूले नहीं होंगे। इससे भारत को दुनिया भर में काफी बदनामी भी झेलनी पड़ी। आज भी कुछ लोग और संगठन अपने स्वार्थो तथा मनमानी के चलते शांति के मार्ग में रोड़ा बने हुए हैं और वे देश को बदनाम करने का कोई अवसर कभी नहीं नही छोड़ते।
• टी.सी. चन्दर




Sunday, August 29, 2010

जन्माष्टमी-२०१०

श्री सनातन धर्म महिला समिति का
१२वां भव्य आयोजन
२ सितम्बर, २०१०, गुरुवार
श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव २०१०
आप सादर आमन्त्रित हैं
आयोजक: मन्जू गोपालन
विवरण पर्चा


































पृष्ठ ४ और १ (ऊपर), पृष्ठ २-३ (नीचे)
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Wednesday, August 25, 2010

माता-पिता

मातृ देवो भव, पितृ देवो भव

हम यह मान बैठे हैं कि समूची सृष्टि हमारे उपभोग के लिए है। उस पर हमारा ही अधिकार है, हम जैसे चाहें उसका उपभोग करें-उचित या अनुचित। हमें अपने दायित्वों का प्रायः ध्यान नहीं रहता या कहें, हम इस बात का ध्यान रखना ही नहीं चाहते। यह शुतुर्मुर्गी प्रवृत्ति हमें राक्षस बना रही है।

चित्त में मलिनता, संकीर्णता, दुर्भावना, राग-द्वेष आदि वृत्तियाँ भरी हुई हैं और तरह-तरह की वासनाएं लहर मार रही हैं। ऐसे में भजन-कीर्तन, सत्संग, तीर्थ यात्रा, प्रभु स्मरण आदि से कुछ भी भला होने वाला नहीं है। कलुषित मन मनुष्य को परमात्मा के आसपास भी नहीं फटकने देता। जो प्रभु को प्रिय है उसे अपनाए बिना प्रभु के निकट कोई पहुंच भी कैसे सकता है! इससे अभिन्नता के बिना उसकी प्राप्ति असम्भव है।

ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने जब तक मिला गाय का दूध दुहा और उपयोग किया। उसके बछड़े से खेले। उसे गाय माता के रूप में पूजा। जब गाय को दुह लिया तो उसे गलियों-सड़कों पर आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया। या फिर जब उसने दूध देना बन्द कर दिया तो गाय व्यर्थ हो गयी और उसे कसाई के हवाले कर दिया। अब ‘माता’ किस काम की! बूढ़ी, कमजोर और अनुपयोगी मां भी भला काम आ सकती है! बिलकुल यही स्थिति भारतीय घरों में माता-पिता के मामले में हो रही है। यह उपयोगितावादी प्रवृत्ति आज के समय में पहले की अपेक्षा कहीं अधिक तेजी से पनप रही है।

यह सोच कि बूढ़े हो चुके माता-पिता अब किस काम के हैं, काफी खतरनाक और हिंसक है। एक परिवार में दादा-दादी को मिट्टी के बरतन और पत्तलों में खाना खाते देख पोते ने सवाल किया तो दादा ने कहा कि जब आदमी बूढ़ा हो जाता है तो किसी काम का नहीं रहता सो उसके लिए ऐसे बरतन ही ठीक हैं। शाम को जब पापा घर आए तो बेटे ने उनसे मिट्टी के बरतन और पत्तलें लाने को कहा। पापा के कारण पूछने पर बेटे ने दादा की कही बात दुहरा दी। यह पता नहीं कि बेटे की बात सुनकर पापा की आंखें खुलीं या नहीं पर वास्तविकता यही है कि हम बबूल बोकर आम पाने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।

दरअसल हम यह मान बैठे हैं कि समूची सृष्टि हमारे उपभोग के लिए है। उस पर हमारा ही अधिकार है, हम जैसे चाहें उसका उपभोग करें-उचित या अनुचित। हमें अपने दायित्वों का प्रायः ध्यान नहीं रहता या कहें, हम इस बात का ध्यान रखना ही नहीं चाहते। यह शुतुर्मुर्गी प्रवृत्ति हमें राक्षस बना रही है। जिन्होंने अपनी सन्तान के लिए अपना तन-मन-धन सब न्यौछावर कर दिया, उनके भविष्य और आने वाली पीढ़ी के लिए स्वयं को अर्पित कर दिया। सदा अपनी सन्तान के सुख की खातिर अपना सुख नहीं देखा। इसके बदले उन्हें मिला क्या? वृद्धाश्रम, अनाथाश्रम, विधवाश्रम या महिलाश्रम आदि ही न!

बुजुर्गों के लिए नित नये ‘आश्रम’ बन रहे हैं। उनके लिए घर में जगह नहीं है। अंग्रजी शिक्षित परिवारों, सुसज्जित आधुनिक घरों और स्वार्थी लोगों में चुके हुए पुराने जमाने के मां-बाप फिट नहीं बैठते। उनकी धन-सम्पत्ति और जमीन-जायदाद ही काम की होती है। बुजुर्गों के प्रति ऐसा रवैया मानसिक रूप से बीमार समाज का परिचायक है। यह स्थिति सचमुच दुःखद, दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है।

अनुभवों की खान बुजुर्गों की उपेक्षा-अनदेखी निःसन्देह अशुभ है। मानव जीवन की उन्नति और सद्गणों के विकास के लिए वृद्धजनों की उपस्थिति आवश्यक और परम सौभाग्य की बात है। हम अपनी विश्व प्रसिद्ध संस्कृति के विरुद्ध आचरण करने लगे हैं। ऐसे आचरण के कुछ दुष्परिणाम तुरन्त दिखने लगते हैं और अनेक ऐसे दुष्परिणाम होते हैं जिनका असर दूरगामी तथा व्यापक होता है।

एक परिवार में हर उम्र के लोगों के लिए कोई न कोई उपयुक्त काम होता है। यह आवश्यक नहीं कि हर कार्य का मूल्यांकन आर्थिक लाभ के रूप में ही हो। हमारी संस्कृति के विकास के साथ-साथ ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’ की भावना निरन्तर बलवती हुई है। संयुक्त परिवारों के टूटने के मूल में स्वार्थ, मेरा-तेरा की भावना, संकुचित विचार आदि के अलावा उपयोगितावाद की प्रमुख भूमिका रही है। आज भी ऐसे अनगिनत सुखी परिवार ऐसे हैं जिनपर माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और परिवार के अन्य बुजुर्गों की छत्रछाया बनी हुई है। उनको पर्याप्त सम्मान मिलता है। उनकी सलाह को माना जाता है। इसका सुखद प्रभाव परिवार के बच्चों पर भी पड़ता है। ऐसे परिवारों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। इसके लि स्वकेन्द्रित होने की भावना को छोड़ना होगा।

अपने घरों में बुजुर्गों की स्थिति देखने में कुछ समय लगाएं और स्वयं उचित अनुचित का आकलन करें। आवश्यकतानुसार उपयुक्त आचरण कर अपने व्यवहार में बदलाव लाएं। प्रेम, धैर्य, निष्ठा आदि के साथ अपने बड़ों की सेवा करें। परिवार के अर्थ को मै-मेरी पत्नी-मेरे बच्चे से आगे बढ़कर व्यापक बनाएं। जैसे उन्होंने अपनी सामर्थ्य या उससे आगे बढ़कर हमारा ध्यान रखा, हमें सामर्थवान बनाया वैसे ही हमें अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। हम उनका ऋण नहीं चुका सकते पर उन्हें सुख पहुंचाने का यथासम्भव प्रयास तो कर ही सकते हैं।

आज वृद्धाश्रम आदि के विकल्प अपनाए जाने की भी आवश्यकता है। जिस प्रकार किसी छोटे बच्चे को गोद लेकर पालन-पोषण कर पढ़ा-लिखाकर बड़ा करते हैं, वैसे ही जिनके माता-पिता नहीं हैं वे चाहें तो ‘माता’ या ‘पिता’ या दोनों को गोद लेकर उनकी सेवा कर संतुष्टि पा सकते हैं। यों यह काम कर पाना आसान नहीं है पर यदि ठान लिया जाए तो अधिक मुश्किल भी नहीं है। इतना सम्भव न हो तो अपने कीमती समय का कुछ भाग अकेले रह रहे बुजुर्गों के साथ बिताना और उनकी सहायता करना भी अनूठा सुख देगा। उनके सुख के लिए यथाशक्ति और यथासम्भव प्रबन्ध भी किया जा सकता है।

ऐसे अनेक वृद्धजन हैं जिनकी नालायक सन्तानों ने उनके धन-संपत्ति पर अनुचित तरीके से कब्जा कर उन्हें दूध से मक्खी की भांति निकालकर फैंक दिया है। उन्हें अनेक प्रकार से कष्ट पहुंचाए हैं। ऐसे ही कुछ बुजुर्ग विवश होकर न्याय पाने के लिए अपनी ही औलाद के विरुद्ध अदालत की शरण में से पहुंचे हैं। यह स्थिति सचमुच शर्मनाक है। अनेक परिवार ऐसे हैं जिनमें पति-पत्नी दोनों ही नौकरी या व्यवसाय करते हैं। विशेष रूप से ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की उपस्थिति की उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता।

Saturday, June 5, 2010

जातपांत

जात गिनाना ही मनुवाद है


जन-गणना में जात को घुसाना सबसे बड़ा 'मनुवाद' है| यह हमारे संविधान का संपूर्ण नकार है| हमारा संविधान जातिविहीन समाज का उद्रघोष करता है लेकिन जो जात का जहर घोलने पर अमादा हैं, उनका आदर्श भारत का संविधान नहीं, 'मनुस्मृति' है| उनका जातिवाद उन्हें भस्मासुर बना देगा| वंचितों के मलाईदार नेता अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| उनकी जातियों के ही दबे-पिसे लोग उनकी छाती पर चढ़ बैठेंगे|


जन-गणना में जाति गिनाने के पक्ष में अजीबो-गरीब तर्क दिए जा रहे हैं| पहला तर्क यह है कि जाति हिंदुस्तान की सच्चाई है| इसे आप स्वीकार क्यों नहीं करते ? यह तर्क बहुत खोखला है, क्योंकि इस देश में जाति ही नहीं, अन्य कई सच्चाइयाँ हैं| क्या हम उन सब सच्चाइयों को स्वीकार कर लें ? जैसे भारत में हिंदुओं की संख्या सबसे ज्यादा है तो हम इसे हिंदू राष्ट्र घोषित क्यों न कर दें ? भारत में भ्रष्टाचार पोर-पोर में बसा हुआ है तो हम भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय शिष्टाचार की मान्यता क्यों न दे दें ? राजनीति का उद्देश्य वास्तविकताओं के सामने घुटने टेकना नहीं है बल्कि उनको बदलना है| डॉ. आंबेडकर और डॉ. लोहिया ने जो जातिविहीन समाज का सपना देखा था, उसे हमने कहां तक आगे बढ़ाया है ?

1931 के बाद अंग्रेज ने और आजाद भारत की सरकारों ने भी जात की गिनती नहीं की, इसके बावजूद भारत में जात जिंदा है, इसमें शक नहीं लेकिन वह राजनीति में जितनी जिंदा है, उतनी हमारे सामाजिक और शैक्षणिक जीवन में नहीं है| अस्पृश्यता काफी घटी है, सहभोज तो आम बात है और अंतरजातीय विवाह पर अब पहले-जैसा तूफान नहीं उठता है| ज्यों-ज्यों शिक्षा और संपन्नता फैलती जा रही है, जात का असर घटता जा रहा है लेकिन जातिवादी नेताओं के लिए यही सबसे बड़ा खतरा है| वे अपने वोट बैंक को फेल नहीं होने देना चाहते| इसीलिए जन-गणना में वे जात को जुड़वाने पर आमादा हैं| उनका अपने चरित्र्-बल, बुद्घिबल और सेवा-बल पर से विश्वास उठ गया है| वे केवल अपने जातीय संख्या-बल पर निर्भर होते चले जा रहे हैं| वे सवर्ण नेताओं की भद्दी कॉर्बन कॉपी बन गए हैं| वे देश के वंचितों के प्रति उतने ही निर्मम हैं जितने कि सवर्ण नेतागण !

जन-गणना में जात गिनाने से उन्हें क्या मिलेगा ? आरक्षण तो बढ़ना नहीं है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 50 प्रतिशत की लक्ष्मण रेखा खींच रखी है| इस समय कुल आरक्षण 49.5 प्रतिशत है ! यदि आरक्षित जातियों की जनसंख्या दस-बीस करोड़ ज्यादा भी निकली तो उसका फायदा क्या है ? कुछ नहीं| कम निकलीं तो उलझनें ही उलझनें हैं| यह ठीक है कि अपने जातीय अनुपात के आधार पर नेता लोग राज-काज में अपना हिस्सा मांगेंगे| यदि दलित, आदिवासी और पिछड़े मांगेंगे तो क्या सवर्ण चुप बैठेंगे ? हर वर्ण में सैकड़ों-हजारों जातियॉं हैं, उनमें भी उप-जातियाँ हैं और उप-जातियों में गोत्र् हैं| भारत का सारा राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा हजारों टुकड़ों में बंट जाएगा| मजहब ने देश के दो टुकड़े किए थे, जाति इसे हजार टुकड़ों में बांट देगी| सवर्णों और अवर्णों के बीच तो तलवारें खिंचेंगी ही, जातियों के अंदर अंदरूनी महाभारत भी छिड़ जाएगा|

जन-गणना में जात को घुसाना सबसे बड़ा 'मनुवाद' है| यह हमारे संविधान का संपूर्ण नकार है| हमारा संविधान जातिविहीन समाज का उद्रघोष करता है लेकिन जो जात का जहर घोलने पर अमादा हैं, उनका आदर्श भारत का संविधान नहीं, 'मनुस्मृति' है| उनका जातिवाद उन्हें भस्मासुर बना देगा| वंचितों के मलाईदार नेता अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| उनकी जातियों के ही दबे-पिसे लोग उनकी छाती पर चढ़ बैठेंगे|

देश के 70-80 करोड़ वंचितों को पहली बार पता चल रहा है कि पांच-सात हजार सरकारी नौकरियों पर उनकी जाति के सिर्फ मलाईदार लोग हाथ साफ करते हैं| शेष सभी लोग अज्ञान, अभाव और अपमान का जीवन जीते हैं| उनके लिए न तो सवर्ण नेताओं ने कोई ठोस काम किया और न ही अ-वर्ण नेताओं ने| नौकरियों का आरक्षण पाखंड सिद्घ हुआ| इस पाखंड को बनाए रखने के लिए और करोड़ों वंचितों की आंखों में धूल झोंकने के लिए अब जनगणना में जाति का शोशा छोड़ा गया है|

जाति की गिनती को यह कहकर जायज़ ठहराया जा रहा है कि आपको आंकड़ों से क्या परहेज़ है ? बिना सही आंकड़ों के आप वैज्ञानिक विश्लेषण कैसे करेंगे? ऐसा तर्क करनेवालों से कोई पूछे कि जाति गिनाने में कौनसी वैज्ञानिकता है? सामाजिक और आर्थिक न्याय देने के लिए क्या जानना जरूरी है? जात या जरूरत? जिसे भी जरूरत है, उसे बिना किसी भेदभाव के विशेष अवसर दिया जाना चाहिए लेकिन जात के आधार पर विशेष अवसर देना तो ऐसा है, जैसे कोई अंधा रेवड़ी बांट रहा हो या कोई नौसिखिया वैद्य हर रोगी को दस्त की दवा टिका देता हो| किसका क्या रोग है, यह जाने बिना इस देश में 60 साल से थोक में दवा बंट रही है| इसीलिए मज़र् बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की गई|

कोई यह बताए कि कालेलकर और मंडल आयोगों ने कैसे तय किया कि ये 2300 जातियाँ पिछड़ी हैं? उन्होंने भी उन जातियों की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाने की कोशिश की| कैसे की? आंकड़े इकट्रठे किए| आधे-अधूरे किए लेकिन किए| अब भी करें और ज्यादा करें| गहरे में उतरें और उन आकड़ों के आधार पर समस्त वंचितों को सचमुच विशेष अवसर दें| 50 नहीं, 60 प्रतिशत दें, जैसा कि डॉ. लोहिया कहा करते थे लेकिन यहां जात का क्या काम है? उसे बीच में क्यों घसीट रहे है? संविधान में कहीं भी 'जाति' शब्द नहीं है, पिछड़ा वर्ग है| क्या जाति और वर्ग एक ही है? उस समय जात का सहारा इसलिए लिया गया कि यह रास्ता आसान था| दो साल में कालेलकर और सवा दो साल में मंडल क्रमश: 40 करोड़ और 70 करोड़ लोगों का कूट-परीक्षण कैसे करते? छह-सात हजार जातियों का वैज्ञानिक विश्लेषण असंभव था| इसीलिए उन्होंने जाति का अवैज्ञानिक ही सही, सरल और थोक पैमाना अपना लिया| अब लाखों सरकारी कर्मचारी जन-गणना के लिए उपलब्ध हैं और यह कंप्यूटर का ज़माना है| हम देश के वंचितों की सही और सीधी पहचान क्यों नहीं करते? उस पहचान के आधार पर एक क्रांतिकारी समतामूलक समाज की स्थापना क्यों नहीं करते?

हमारे पिछड़े नेता कहते हैं कि हर नागरिक के पहचान पत्र् में उसकी जात लिखो| यह उनके मनुवाद का निकृष्टतम रूप होगा| जात के नाम पर हम अपने भाइयों को कहां तक अपमानित करेंगे ? भारत सरकार ने तो मतदाता-सूचियों से जातिगत नाम हटा रखे हैं| लेकिन जातिवादी नेताओं के टेके से चल रही यह सरकार ज़रा घबरा गई है| प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बधाई के पात्र् हैं कि उन्होंने हिम्मत दिखाई और सारा मामला दुबारा खोल दिया| इस मुद्दे पर जमकर राष्ट्रीय बहस चलनी चाहिए| भास्कर के दिल्ली संस्करण (11 मई) में 'मेरी जाति, सिर्फ हिंदुस्तानी' लेख छपने के बाद 'सबल भारत' नामक संगठन ने आंदोलन छेड़ दिया है| उसे देश के कोने-कोने से समर्थन मिल रहा है| इस आंदोलन के आयोजकों में अनेक दलित और वंचित वर्गों के शीर्ष लोग भी शामिल हैं| राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सिखों की शिरोमणि सभा, बाल ठाकरे तथा कई अन्य सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों ने इसका समर्थन किया है| अमिताभ बच्चन ने भी अपने ब्लॉग पर 'मेरी जाति भारतीय' लिख दिया है| जन-गणना में जाति को घुसाने का विरोध उतनी ही तन्मयता से होना चाहिए, जैसे कि 1857 में अंग्रेज का हुआ था| यदि हमारे नेतागण इस राष्ट्रविरोधी मांग के आगे घुटने टेक दें तो भारत के नगारिक जाति के कॉलम को खाली छोड़ दें या लिखवाएँ 'मेरी जाति हिंदुस्तानी'!

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

dr.vaidik@gmail.com


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