मैया मेरी

कीर्तन
एक बात मैया मेरी याद रखना... • मन्जू गोपालन/श्री सनातन धर्म महिला समिति, कीर्तन स्थान: बाग मुज़फ़्फ़र खां, आगरा यहां क्लिक करके यू ट्यूब पर देखिए मैया मेरी

Tuesday, July 21, 2009

श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव

श्री सनातन धर्म महिला समिति द्वारा
श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का आयोजन

मंजू गोपालन के अथक प्रयासों और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से हर वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव आयोजित होता है। इसमें छोटे-छोटे बच्चों की प्रमुख रूप से भागीदारी होती है। मंजू गोपालन द्वारा लगभग एक माह तक 10-12 साल तक की आयु के बच्चों को विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया जाता है। काफी अभ्यास के बाद बच्चे मंच पर मनमोहक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं जिसे श्रद्धालु दर्शकों की भरपूर सराहना मिलती है।

श्री सनातन धर्म महिला समिति द्वारा हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है। भाद्रपद श्री कृष्ण अष्टमी, विक्रम सम्वत् 2066 यानी 13 अगस्त, 2009 को स्थानीय शारदा कॉन्वेंट स्कूल 25 फुट रोड, चाणक्य प्लेस के प्रांगण में आयोजित होने वाला यह 11वां कार्यक्रम होगा।

मंजू गोपालन के अथक प्रयासों और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से हर वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव आयोजित होता है। इसमें छोटे-छोटे बच्चों की प्रमुख रूप से भागीदारी होती है। मंजू गोपालन द्वारा लगभग एक माह तक 10-12 साल तक की आयु के बच्चों को विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया जाता है। काफी अभ्यास के बाद बच्चे मंच पर मनमोहक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं जिसे श्रद्धालु दर्शकों की भरपूर सराहना मिलती है। इस अवसर पर सजीव झांकियां, विशेष नृत्य, डांडिया नृत्य, श्री कृष्ण बाल रूप सज्जा, विशेष भजन-कीर्तन, श्री कृष्ण जन्म, प्रसाद वितरण आदि के अलावा विशेष अतिथि द्वारा प्रतिभागी बच्चों को प्रमाण पत्र तथा उपहार प्रदान किये जाते हैं।

स्कूल प्रांगण श्रद्धालुओं से खचाखच भर जाता है। लोग आसपास के मकानों की छत पर बैठकर और सड़क पर खड़े रहकर भी कार्यक्रम देखते हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए गत वर्ष प्रांगण के बाहर एक बड़ा पर्दा लगाया गया जिससे बाहर खड़े लोगों ने भी श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के पूरे कार्यक्रम का आनन्द लिया। इसके साथ ही स्थानीय चाणक्य केबल टीवी नेटवर्क के माध्यम से श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का सीधा प्रसारण भी दिखाया गया। बाद में इस कार्यक्रम को केबल पर ही कई बार दिखाया गया।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के अवसर पर हिन्दी-ब्रज भाषा में आयोजित होने वाला क्षेत्र का एकमात्र अनूठा कार्यक्रम होता है जिसका पूरा श्रेय मंजू गोपालन को ही जाता है। इस धार्मिक आयोजन के लिए क्षेत्रवासी उनकी खूब प्रशंसा करते हैं। धार्मिक प्रवृत्ति की मंजू गोपालन मूल रूप से आगरा की हैं। सन् 1984 से वे दिल्ली में रह रही हैं। चाणक्य प्लेस क्षेत्र में हिन्दी-ब्रज भाषा के भजन-कीर्तन की लोगों की मांग को ध्यान में रखते हुए उन्होंने श्री सनातन धर्म महिला समिति के अन्तर्गत सन् 1995 में छोटी सी कीर्तन मण्डली का शुभारम्भ किया। उनके इस प्रयास की खूब सराहना हुई और लोगों ने उनके भजन-कीर्तन को बहुत पसन्द किया। धीरे-धीरे उनको लोग जान गये।

आज पूरे क्षेत्र में हिन्दी-ब्रज भाषा की उनकी ही एकमात्र मण्डली है। अपने क्षेत्र चाणक्य प्लेस के अलावा वे जनकपुरी, रोहिणी, जीवन पार्क, सागरपुर, महिन्द्रा पार्क, द्वारका, तिलक नगर, राजा गार्डन, हरि नगर, पहाड़ गंज, ककरोला, मधु विहार, महावीर एन्क्लेव, ओम विहार, सीतापुरी, दशरथपुरी, पालम, कनॉट प्लेस, पीतमपुरा, सरिता विहार, दीपाली चैक, उत्तम नगर, नजफगढ़ आदि विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं के आमंत्रण पर वे भजन-कीर्तन का कार्यक्रम प्रस्तुत करती रही हैं। प्रायः जन्म दिन, शादी-विवाह, गृह प्रवेश, नये कार्य या व्यवसाय के शुभारम्भ, किसी शुभ अवसर पर या फिर जब मन करे तब उनसे भजन-कीर्तन करने का आग्रह किया जाता है। नवरात्र के दौरान वे काफी व्यस्त रहती हैं। एक दिन में 3 स्थानों पर भी जाना पड़ता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव का कार्यक्रम रात्रि 8.30 से मध्य रात्रि 12.30 बजे तक जारी रहता है। इस भव्य आयोजन में 10-12 वर्ष तक की आयु के बच्चे शामिल किये जाते हैं। सभी बच्चे पूरे उत्साह के साथ जमकर अभ्यास करते हैं और मंच पर अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। मंच पर नृत्य नाटिका, नृत्य, डांडिया नृत्य आदि के साथ-साथ बाल श्री कृष्ण रूप सज्जा, विशेष अतिथि द्वारा प्रमाण पत्र व उपहार वितरण कार्यक्रम को श्रद्धालु प्रेमपूर्वक देखते हैं और अनेकानेक बार तालियां बजाकर सराहना करते हुए बच्चों का उत्साह बढ़ाते हैं। उल्लेखनीय है कि श्री कृष्ण बाल रूप सज्जा में मोर पंख के उपयोग की मनाही होती है।

*******************
आप
बनें सह
योगी
आप श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के आयोजन में
अपना सहयोग देना चाहें तो आपका स्वागत है।
कृपया सम्पर्क करें- bhajankeertan@gmail.com b
� बच्चों के लिए उपहार (अनुमानित संख्या)- 25
� कार्यक्रम के आयोजन में विविध कार्यों हेतु
� प्रसाद-भण्डारा
आप चाहेंगे तो सहयोगियों की सूची में आपका
नाम भी प्रकाशित किया जाएगा।
*******************
बच्चों की प्रस्तुतियां समाप्त होने के बाद लगभग आधा घण्टा विशेष भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। ठीक मध्य रात्रि 12 बजे जब श्री कृष्ण के जन्म की घोषणा की जाती है तो पूरा वातावरण उल्लासमय हो जाता है। हर तरफ जय कन्हैया लाल की और श्री कृष्ण की जय-जयकार गूंजने लगती है। आरती के बाद भोग लगाया जाता है और फिर पिसे धनिये, देशी घी, बूरे, मेवों फलों आदि से बना विशेष प्रसाद और दही, दूध, तुलसी, 5 मेवाओं, शहद, चीनी आदि से बना चरणामृत श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के छठवें दिन छठी मनायी जाती है। इस अवसर पर अपरान्ह 2 बजे विशेष भजन-कीर्तन कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इसके बाद पारम्परिक रूप से तैयार 6 वस्तुओं- मूंग की दाल, रोटी, कढ़ी, चावल, बेसन के लड्डू और हलुआ के अलावा भण्डारे के रूप में तैयार की गयी सामग्री पूड़ी, आलू की सब्जी और खीर का भोग लगाया जाता है। सायं लगभग 4।30 बजे प्रसाद के रूप में भण्डारे की सामग्री का वितरण किया जाता है जो 4-5 घण्टे निरन्तर चलता रहता है।

यह पूरा आयोजन एक अकेली मंजू गोपालन जैसी महिला की सामर्थ्य के बल पर ही हो पाता है। इन्होंने स्थानीय लोगों को जब कार्य करके दिखया तो धीरे-धीरे लोग जुड़ते चले गये। अब लोग स्वयं आगे आकर अपना सहयोग देने की इच्छा जताते हैं। श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के आयोजन को लेकर अनेक लोगों के विरोध और उनके द्वारा रुकावटें पैदा करने का भी उन्होंने दृढ़ता से सामना किया। कुछ शरारती और स्वयं को प्रभावशाली समझने का भ्रम पाले हुए लोगों ने श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव के आयोजन को रोकने के लिए खूब चालें चलीं। लोगों से सहयोग न करने की अपील वाले पीले रंग के पर्चे भी बंटवाए।

धुन की पक्की मंजू गोपालन ने हार नहीं मान और उन्होंने सब श्री कृष्ण पर छोड़ दिया और वे पूरे परिवार के साथ श्री कृष्ण की सेवा में लगी रहीं। परिजनों का भरपूर सहयोग उन्हें हर बार मिलता रहा। राजनीति में सक्रिय स्थानीय समाज सेवी श्री अनिल ठाकुर इस आयोजन में विशेष रूप से रुचि लेकर गत 3 वर्षों से अपना भरपूर सहयोग दे रहे है। यहां के लोगों को मंजू गोपालन पर जो विश्वास था उसे वे अपनी चालबाजियों से डिगा नहीं सके। मजे की बात यह भी है कि उन चालबाजों में शामिल कुछ लोग अब मंजू गोपालन का ही सहयोग करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस पूरे आयोजन में काफी समय, श्रम, धन आदी की आवश्यकता पड़ती है। मंजू गोपालन की हार्दिक अभिलाषा है कि वे श्री राधा कृष्ण का एक भव्य मन्दिर बनवाएं, देखें उनकी यह अभिलाषा कब पूरी होती है! वैसे उन्होंने अपनी यह अभिलाषा श्री कृष्ण पर ही छोड़ दी है-आप जानें...

प्रस्तुति: वी. कुमार



श्री कृष्ण जन्माष्टमी आयोजन

श्री कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव २००९
आयोजन का सूचना पत्रक पृष्ठ १, २, ३ व ४


Monday, May 4, 2009

मन्त्र

असरदार होते हैं मंत्र

मन्त्रों के प्रभाव को लेकर देश-विदेश में निरन्तर शोध भी होते रहे हैं। डॉ. लिवर लिजेरिया एवं अन्य का मानना है कि ह्रीं, ॐ, हरि आदि के उच्चारण का शरीर के विभिन्न भागों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। डॉ. लिजेरिया ने अपने 17 साल के शोध में पाया कि हरि के साथ ॐ को जोड़कर उच्चारण किया जाए तो इसका सकारात्मक प्रभाव शरीर की पाचों ज्ञानेन्द्रियों पर पड़ता है।

मंत्रों के प्रयोगों और उनके प्रभावों के अनगिनत उदाहरण हमारे ग्रन्थों में मौजूद हैं। देखने-पढ़ने में मन्त्रों के शब्दों का कोई खास अर्थ नहीं मालूम पड़ता। पर मन्त्र हमारी सोई शक्ति को जगाने और संकल्प को वातावरण में विसरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मन्त्रों का अति सूक्ष्म पर बड़ा प्रभाव होता है। मन्त्र विज्ञान एक अनूठा विज्ञान है जिसका उचित लाभ मिलना इसके ज्ञाता गुरु और उपयुक्त साधक पर निर्भर करता है और तभी मन्त्र की महिमा सामने आती है।

मन्त्रों के सही उच्चारण, शब्दों के उचित संयोजन, साधक की श्रद्धा, जप, एकाग्रता, सदाचार आदि का मन्त्र जाप के फलदायी प्रभावों को प्रभावित करते हैं। यदि साधक की साधना में किसी प्रकार की कमी है तो अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। मन्त्रोच्चार में शब्दों का सही संयोजन और अक्षरों तथा मात्राओं का सही उच्चारण होना चाहिए। संस्कृत में हृस्व और दीर्घ की गलती भी महत्व रखती है। साधक को पूर्ण श्रद्धा, संयम और एकाग्रता के साथ अपना कार्य करना चाहिए अन्यथा मन्त्र का प्रभाव बदल जाएगा। मन्त्रों का प्रभाव ब्रह्माण्डव्यापी होता है। रामचरिमानस के रचयिता तुलसीदास के अनुसार-
मन्त्र जाप मम दृढ़ विस्वासा।
पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

मन्त्रों के प्रभाव को लेकर देश-विदेश में निरन्तर शोध भी होते रहे हैं। डॉ. लिवर लिजेरिया एवं अन्य का मानना है कि ह्रीं, ॐ, हरि आदि के उच्चारण का शरीर के विभिन्न भागों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। डॉ. लिजेरिया ने अपने 17 साल के शोध में पाया कि हरि के साथ ॐ को जोड़कर उच्चारण किया जाए तो इसका सकारात्मक प्रभाव शरीर की पाचों ज्ञानेन्द्रियों पर पड़ता है। यहां तक कि निःसन्तान दम्पति को सन्तान की प्राप्ति हो जाती है। यह आज के शोध के परिणाम हैं पर हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले इस बात को जानकर शास्त्रों में लिख दिया था। उनके द्वारा मन्त्रों के प्रभाव को लेकर की गयी खोज में उन्हौंने स्थूल शरीर को ही नहीं अपितु समूचे विश्व को आधार बनाया था।


निराकार और साकार को लेकर भी विभिन्न धर्मानुयायियों में चर्चा होती रही है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि आकृति और शब्द का परस्पर गहरा सम्बन्ध है। किसी सम्बोधन या शब्द के साथ आकृति का सम्बन्ध होना अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी होता है। जैसे हाथी शब्द दो अक्षरों और दो मात्राओं के मेल से बना है, इसके साथ उस शाकाहारी पशु की विशालकाय आकृति का सम्बन्ध है जो जंगल में रहता है और बुद्धिमान होता है। हाथी शब्द के उच्चारण के साथ ही उसकी छवि मानसपटल पर आ जाती है।


ऋषि-मुनियों का मानना था कि हमारा भौंतिक शरीर अन्नमय है, इसके भीतर प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय चार शरीर और भी हैं। यदि शरीर से प्राणमय निकल जाए तो अन्नमय शरीर निर्जीव हो जाएगा। प्राणमय शरीर का संचालन भी मनोमय शरीर करता है। मन के संकल्प-विकल्प के आधार पर ही प्राणमय शरीर क्रियाशील रहता है और मनोमय शरीर के भीतर विज्ञानमय शरीर होता है। पांचों ज्ञानेन्द्रियां और बुद्धि को विज्ञानमय शरीर कहते हैं। बुद्धि के द्वारा किये गये निर्णय के अनुसार शारीरिक अंग सक्रिय होकर सम्बन्धित कार्य को पूरा करते हैं। इस विज्ञानमय शरीर से भी अधिक गहराई में आनन्दमय शरीर होता है। हम जो भी प्रयास करते हैं वह आनन्द के लिए करते हैं, परमात्मा आनन्दस्वरूप होता है और इस कोष के निकट स्थित कोष को आनन्दमय कोष कहते हैं। इस प्रकार हम जिस आनन्द का अनुभव करते हैं वह परमात्मा का आनन्द है। वह आनन्दस्वरूप है और मन्त्र उस परमात्मा तक के पांचों कोषों को प्रभावित करता है। ईश्वर नाम के जप का इन कोषों, समस्त नाड़ियों और सातों केन्द्रों में सात्विक प्रभाव पड़ता है।
टी.सी.चन्दर
सौजन्य: प्रभासाक्षी.कॉम

Thursday, April 9, 2009

व्यवहार

गाय और गौवंश के प्रति जरूरी है मानवीय व्यवहार
गाय हमें निःस्वार्थ भाव से अनेक वस्तुएं प्रदान कर उपकृत करती है। अन्न उगाने के लिए गोबर के रूप में हमें श्रेष्ठतम और निरापद खाद देती है जिसका मुकाबला कोई भी रासायनिक खाद नहीं कर सकती। अमृत जैसा सुपाच्य, बहुउपयोगी और पौष्टिक दूध देती है। अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में गाय हमें निरन्तर उपकृत करती रहती है। इस पूजनीय पशु के प्रति आज मानव का व्यवहार सचमुच निकृष्ट और निन्दनीय है।

भले ही हम गाय को माता के रूप में मानते हैं जिसकी तुलना ईश्वर से की जाती है। मां जन्म देती है, पालन-पोषण करती है और स्वयं कष्ट उठाकर सन्तान को सदा सुख पहुंचाना चाहती है। सभी ने मां को महान बताया है। गाय को हमारे यहां दूसरी पालक माता माना गया है जिसका हमारे जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। इस मार्मिक सच्चाई को समझने की आज बहुत अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को प्रकृति ने यथासम्भव अधिकतम दिया है पर मनुष्य उसके उपकार को न मानते हुए प्रकृति पर ही अनेकानेक अत्याचार करता रहता है। अधिकांश लोगों का गाय और गौवंश के प्रति, विशेष रूप से उसके पालकों का व्यवहार ही उचित नहीं है।

गाय हमें निःस्वार्थ भाव से अनेक वस्तुएं प्रदान कर उपकृत करती है। अन्न उगाने के लिए गोबर के रूप में हमें श्रेष्ठतम और निरापद खाद देती है जिसका मुकाबला कोई भी रासायनिक खाद नहीं कर सकती। अमृत जैसा सुपाच्य, बहुउपयोगी और पौष्टिक दूध देती है। अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में गाय हमें निरन्तर उपकृत करती रहती है। इस पूजनीय पशु के प्रति आज मानव का व्यवहार सचमुच निकृष्ट और निन्दनीय है।

अपने स्वार्थ के लिए गाय को आदमी पालता है। जब उसकी स्वाथ पूर्ति में किसी प्रकार की रुकावट या कमी आती है तो वह गाय या गोवंश की उपेक्षा करने लगता है। वह गोवंश को आवारा घूमने और अपना भोजन स्वयं तलाशने के लिए यूं ही छोड़ देता है। प्रायः गर्भवती गायें सड़क किनारे या खाली पड़ी जमीन पर बछड़े को जन्म देती दिखाई देती हैं। कोई धर्मभीरु महिला या पुरुष उसकी यथासम्भव सेवा-सुश्रूषा भले कर दे पर उसका पालक इस बारे में अनभिज्ञ ही बना रहता है। यहां तक कि गो वंश के शरीर पर गर्म लोहे आदि से अपने स्वामित्व की पहचान के लिए कोई चिन्ह या शब्द दाग देते हैं।

हमारे यहां गोवंश प्रायः कूड़दानों के पास अड्डा जमाये रहता है। इस निरीह और शाकाहारी गोवंश के सदस्यों को कूड़े के ढेर में से सड़ा-गला खाद्य-अखाद्य जो भी मिले उसके उदर में जाता है। पानी की कमी और उपेक्षा के चलते इन निरीह पशुओं को भला पानी कौन पिलाए! ऐसे में ये पशु प्रायः अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। इनके पेट में खाद्य-अखाद्य पदार्थों के अलावा लकड़ी, कांच, लोहे, प्लास्टिक आदि के टुकड़े, कागज, पाॅलिथिन, कीलें, कंकड़-पत्थर, मिट्टी आदि पहुंच जाते हैं जो इनकी मौत या विकलांगता और रोगी होने का कारण बनते हैं। यही नहीं ये पशु छोटी-बड़ी दुर्घटनाओं के श्किार हो जाते है और स्वयं भी दुर्घटनाओं के कारण बन जाते हैं जिससे अन्य लोगों को शरीरिक व आर्थिक हानि उठानी पडती है।

आवारा घूमने वाले पशुओं को कभी-कभी पकड़कर कांजी हाउस या गौशालाओं में रखा जाता है। वहां भी इनके साथ दुर्व्यवहार और ठीक प्रकार से देखभाल न करने की खबरें प्रायः अखबारों में आती रहती हैं। उपयोगी न रहने पर गोवंश के सदस्यों को कसाइयों को बेच दिया जाता है। इन मूक पशुओं को चुराकर कसाइयों को बेचने वाले भी हमारे यहां सक्रिय रहते हैं। कभीकभार ये लोग पकड़े भी जाते हैं। देश में सरकारी सहमति से नये-नये कसाईघर भी खुल रहे हैं। बैलों के उपयोग की जगह ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग ने भी हमारे पशुधन को उपेक्षा का शिकार बना दिया है। देश में तेजी से घटता पशुधन सचमुच चिन्ता का विषय है।

यह निःसन्देह खतरे की घन्टी है। नियम-कानून बनाने से कुछ नहीं होने वाला। गोवंश पालकों के अलावा हम सभी को अपनी थोड़ी सी जिम्मेदारी और सज्जनता का परिचय देना चाहिए। अच्छा यही है कि समय रहते हम चेत जाएं और गोवंश की उपेक्षा के स्थान पर उसके उपयोग और उपकारों का ध्यान रखते हुए उस पर अत्याचार बन्द कर दें तथा उसका अपेक्षित ध्यान रखें।
मंजू गोपालन

Wednesday, October 1, 2008

आस्था

वैज्ञानिक कसौटी पर खरे हैं हिन्दू धार्मिक अनुष्ठान

हर हिन्दू घर में प्रायः तुलसी होना और स्नान कर उसकी पूजा करना अनिवार्य माना जाता है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि तुलसी का पौधा एक उच्च स्तर का एन्टीबायटिक होता है। यह अनेकानेक विषाणुओं को नष्ट करने की असीम क्षमता रखता है। अनेक सामान्य और असामान्य रोगों में तुलसी के पत्तों का उपयोग किया जाता है। जहाँ तुलसी का पौधा लगा होता है वहां आसपास का वातावरण शुद्ध और कीटाणुरहित हो जाता है।
A Hindu woman performing a religious ceremony around the tulsi plant by D.V. Dhurandhar, Bombay, C।1890 (courtesy V&A Museum, London).

हमारे यहां अनकानेक धार्मिक अनुष्ठानों का प्रचलन बना हुआ है। जहां कुछ अनुष्ठान पूजा-पाठ से सम्बन्धित हैं वहीं कुछ अनुष्ठान हमारे रीतिरिवाजों से सम्बन्धित हैं। आज शिक्षित और आधुनिक बने अनेक लोग इन धार्मिक अनुष्ठानों को अंधविश्वास और ढकोसला मानते हैं। पर ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अधिकांश धार्मिक अनुष्ठानों को वैज्ञानिक आधार वाले कार्य मानते हैं।

नियमित रूप से घर के आसपास बने मंदिर में जाना हमारे यहां एक अच्छी समझी जाने वाली परम्परा है। अनेक लोग प्रातःकाल नित्यकर्म व स्नानादि से निवृत होकर मंदिर जाया करते हैं। वास्तविकता यह है कि सूर्योदय होते समय स्नान करने पर सूर्य की किरणें हमारे शरीर पर पड़ती हैं। यह हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। प्रातःकाल मंदिर जाने से भले ही कुछ दूर जाना हो, टहलना हो जाता है। इस प्रकार प्रातः भ्रमण और हल्के व्यायाम की हमारे शरीर की आवश्यकता पूरी होती है।

मंदिर में मन्त्रोच्चार किया जाता है। प्रत्येक मन्त्र में एक निर्धारित स्वर विधान होता है इससे मन्त्रोच्चार के समय सभी स्वरों की प्रतिध्वनि परस्पर टकराती है जिससे उसकी ऊर्जस्वशक्ति में वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार रेडियम किरणें उत्पन्न होती हैं जिससे हमारे शरीर एवं मन के नकारात्मक द्रव्यों को नष्ट कर देती है। मस्तिष्क एक धनात्मक विद्युत आवेग का केन्द्र बनकर अनूठी शक्ति बन जाता है। शब्द शक्ति के संचय से मन की कल्पनाशक्ति जाग्रत हो जाती है। इससे मन केन्द्रित होता है और उसकी सक्रियता बढ़ जाती है।

मंदिरों में पूजा-अर्चना के समय शंख व घन्टे या अन्य लोकवाद्य बजाए जाते हैं। इनसे उत्पन्न ध्वनि से आसपास के वातावरण में एक विशेष प्रकार की उष्णता का संचार होता है। विभिन्न लोकवाद्यों द्वारा उत्पन्न ध्वनि एक प्रकार की विद्युत तरंगों के स्पंदन से अलौकिक विद्युत प्रवाह का संचरण होता है। इससे सम्पूर्ण वातावरण के साथ-साथ हमारा मन भी शुद्ध हो जाता है। वायु शुद्ध हो जाती है। ध्वनि से उत्पन्न उष्णता हमारे रक्त स्नायुओं को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। इससे शरीरस्थ चक्रों में गति उत्पन्न हो जाती है, फलस्वरूप रक्त शुद्धि की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है और ग्रंथियों के रस प्रवाह में भी तेजी आ जाती है। इस प्रकार मन के विकारों से मुक्ति पाकर हम मानसिक रूप से स्वयं को मजबूत बना पाते हैं। हमारी क्रियाशीलता और उत्साह में वृद्धि हो जाती है और हमारे आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता है।

मंदिर में पूजा समाप्त होने पर आरती की जाती है। आरती में प्रयुक्त दीपक की ज्योति से आसपास का वातावरण ऊष्मामय हो जाता है। इससे अनेकानेक रोगों को जन्म देने वाले विषाणुओं का नाश होता है। आरती में प्रायः कपूर, धूप आदि का उपयोग किया जाता है जिसकी गंध विषाणुओं के लिए घातक होती है। ऊष्मा के कारण आसपास की वायु गर्म होती है और खाली स्थान बन जाता है जिसकी पूर्ति हेतु वहां ताजी हवा प्रविष्ट होती है।

हवन पूजा का एक विशेष अंग होता है। अग्नि में धूप, घी, चन्दन, तिल, जौ, गेहूं, धान, नारियल आदि अनेक पदार्थ शामिल कर समर्पित किए जाते हैं। इन पदार्थों की आहुति देने पर जलने से उत्पन्न धुएं से आसपास के क्षेत्र के रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। यहां तक कि हवन-यज्ञ से वर्षा कराना भी सम्भव है।

पूजा के बाद प्रसाद वितरण का अपना विशेष महत्व होता है। प्रसाद में पंचामृत या चरणमृत को शामिल अवश्य किया जाता है जो दूध, दही, तुलसी, गंगाजल और मधु जैसे 5 पदार्थों को मिलाकर बनाया जाता है। चरणामृत एक प्रकार से औषधि बन जाता है। इसका सेवन करने से शरीर में अनूठी शक्ति का संचार होता है। इससे शारीरिक दुर्बलता, क्षय, निमोनिया, टाइफायड यानी मियादी बुखार आदि में लाभ मिलता है। रक्त शुद्धि में चरणमृत सहायक होता है और यह रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि भी करता है। तन ओर मन दोनों शुद्ध होते हैं और उन पर दूषित वातावरण का प्रभाव नहीं पड़ता।

मंदिर जाने वाले अधिकांश भक्त शिवलिंग पर जल व दूध चढ़ाते हैं। वे शिवलिंग का स्पर्श करते हैं और अपनी आंखों, मुह व चेहरे का स्पर्श भी कराते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि निरन्तर जल व दूध चढ़ाने से शिवलिंग पर एक भिन्न प्रकार की विद्युत शक्ति उत्पन्न हो जाती है। यह विद्युत शक्ति स्पर्श के माध्यम से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाती है। शरीर का कायाकल्प करने वाली इस शक्ति से मन में आणविक शक्ति का संचार होता है।

हर हिन्दू घर में प्रायः तुलसी होना और स्नान कर उसकी पूजा करना अनिवार्य माना जाता है। यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि तुलसी का पौधा एक उच्च स्तर का एन्टीबायटिक होता है। यह अनेकानेक विषाणुओं को नष्ट करने की असीम क्षमता रखता है। अनेक सामान्य और असामान्य रोगों में तुलसी के पत्तों का उपयोग किया जाता है। जहां तुलसी का पौधा लगा होता है वहां आसपास का वातावरण शुद्ध और कीटाणुरहित हो जाता है। मच्छरों का प्रकोप समाप्त या कम हो जाता है। तुलसी की पत्तियां और बीजों का सर्दी-जुकाम, बुखार, खांसी आदि सामान्य रोगों में लोग लम्बे समय से प्रयोग करते आ रहे हैं। तुलसी के पौधे की असाधारण क्षमता और इसके गुणों को देखते हुए व्यापक जनहित में इसे हमारे मनीषियों ने पूजा में शामिल कर दिया।

हमारे यहां बच्चे के जन्म के बाद उसका नामकरण संस्कार सम्पन्न होता है और उसकी आयु 1, 2, 3 या 5 साल होने पर मुंडन संस्कार होता है। सामान्यतः यह एक धार्मिक कार्य ही माना जाता है और उसी रूप में सम्पन्न किया जाता है। चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के अनुसार यदि जन्म के बाद बच्चे के बालों का एक बार मुंडन कर दिया जाए तो उसके बालों की अच्छी वृद्धि होती है और उसके पूरे सिर पर अच्छे बाल आते हैं। बाल जल्दी झड़ते भी नहीं हैं।

यज्ञोपवीत संस्कार को आज के समय में अनेक लोग हास्यास्पद मानते हैं। वे इसे पंडितों की आजीविका का एक साधन मात्र मानते हैं। दरअसल वे यज्ञोपवीत के धागों के वैज्ञानिक महत्व से अनजान हैं। यज्ञोपवीत के तीन धागे वायु-पित्त-कफ, इड़ा-पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी पर अपना प्रभाव डालते हैं यानी उदर में चुम्बकीय धाराओं का प्रवाह तीव्र हो जाता है। इससे पाचन शक्ति सुदृढ़ हो जाती है। मल-मूत्र त्याग के समय यज्ञोपवीत को कान पर लपेटा जाता है, इससे लकवा मारने का खतरा नहीं रहता। पाचन ठीक रहता है। इसका प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है। एक्यूप्रेशर पद्धति में भी माना जाता है कि कानों को बार-बार खींचने से कब्ज की शिकायत दूर होती है।

हिन्दू विवाह पद्धति की आलोचना करने वालों की भी कमी नहीं है। वे इसे भी ढोंग मानते हैं। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि शास्त्रानुसार किये गये विवाह का नवदम्पति के अन्तर्मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। परस्पर मनमुटाव होने पर भी वे अलग होने का प्रयास नहीं करते। उनके बीच एक भावात्मक एकता बनी रहती है।

अंतिम संस्कार को लेकर भी कुछ तोग कटाक्ष करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार जब कोई प्राणी मरता है तो उसके शरीर से असंख्य जीवाणु चारों ओर फैल जाते हैं। ये जीवाणु अनेक साध्य-असाध्य रोगों के कारण बन सकते हैं। अतः इस स्थिति से बचने के लिए मृत शरीर का दाह संस्कार किया जाता है। जो लोग दाह संस्कार में शामिल होते हैं उनके परिजन उस दिन उपवास रखते हैं। इसके पीछे का कारण यह है कि कहीं भोजन के माध्यम से जीवाणु शरीर में प्रवेश न कर जाए। दाह संस्कार के बाद हाथ-पैर धोने, स्नान करने, मिर्च खाने जैसी क्रियाओं से जीवाणु का खतरा टल जाता है। मिर्च को जीवाणुओं अच्छा प्रतिरोधक माना जाता है।

हमारे पूर्वजों ने विभिन्न क्रियाकलापों को आवश्यकतानुसार धार्मिक अनुष्ठानों का रूप दे दिया जो निःसन्देह हमारे ही हित में है। हमारे ये संस्कार वैज्ञानिक कसौटी पर भी खरे उतरते रहे हैं। प्राचीन काल से ही प्रचलित हमारी विभिन्न परम्पराएं, संस्कार, धार्मिक अनुष्ठान आदि हमारे ऋषि-मुनियों-मनीषियों की सोच, परख और दूरदृष्टि के परिणाम हैं जिन्हें उन्होंने व्यापक जनहित में स्थापित किया।
टी.सी. चन्दर/www.prabhasakshi.com

१

Thursday, August 21, 2008

श्री कृष्ण जन्माष्टमी २००८

श्री सनातन धर्म महिला समिति द्वारा १०वाँ भव्य आयोजन
श्री कृष्ण जन्माष्टमी २००८
सूचना पत्र /आमंत्रण पत्र
कृपया बड़ी छवि देखने के लिए छवि पर क्लिक करें







पृष्ठ -१ एवं २
...........................................







पृष्ठ -३ एवं ४
................................................
जय श्री कृष्ण! आपका स्वागत है!

Friday, May 23, 2008

झांकी Jhankee

श्री सनातन धर्म की जय! माता की जय!! श्री कृष्ण की जय!!!
श्री सनातन धर्म महिला समिति
Shree Sanatan Dharm Mahila Samiti
अध्यक्ष: मन्जू गोपालन

















जय श्री कृष्ण! Jay Shree Krishna!










मंजू गोपालन द्वारा श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर प्रस्तुत भजन कार्यक्रम
Manju Gopaalan dwaaraa Shree Krishna Janmashtamee ke
avsar par prastut Bhajan kaaryakra









श्री कृष्ण जन्माष्टमी Shee Krishna Janmashthmee 06/Cable Strip
बच्चों द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम
Bachchon dwaaraa prastut kaaryakram




















































भजन प्रस्तुति Bhajan प्रस्तुति






सम्पर्क

सम्पर्क
भजन कीर्तन